Jun 15 2017

Learn love lessons from Lord Krishna and Radha

Lord Krishna and Radha

Lord Krishna and Radha Love Story

 

 
Krishna,The Prince of Affection

Radha-Krishna’ are names that can’t be taken without the other. These two names are constantly talked in a solitary breath as though they are one. Without Radha, Krishna is imperfect and without Krishna, Radha can never be complete . Doesn’t it say a more regards to the sort of endless love these two offer? They deified their story in time and gave another definition to the importance of real romance.

 

Love for their Parents

Krishna was destined to Devaki and Vasudev, yet he was raised by Yashoda and Nand. He had an awesome regard for each one of them and was prepared to complete every one of his obligations and duties towards them. It is one of the best love knowledge to gain from Lord Krishna. One must love and commit himself to their kindness of guardians.

 

Dedication towards your partner 

At the point when Lord Krishna used to play his flute, Radha would get mesmerized at the time and would leave everything to move around him. On the off chance that you adore your love one, at that point be completely committed towards them simply like Radha was towards Lord Krishna.

 

Never Give Up On Someone You Love

Krisha had a extensive love for the flute, and he played constantly it in light of his dedication in spite of war time it was close by his side . Interests and enthusiasm, can inhale new life into us when we’re overpowered. We can Learn love lessons from Lord Krishna and Radha

 

Love for Justice

Lord Krishna was an encapsulation of adoration and equity. He battled against his own kin to set up the administer of law and peace. On the off chance that you have read the Mahabharata, at that point you should realize that he helped the Pandavas in the fight. He did as such simply because the Pandavas were in favor of justice.

 

Love for his Friend

Being admired by among the Hindu Gods Lord Krishna has left a permanent impact on the Indian people, particularly the Hindus. His affection for Sudama demonstrates his esteemed fellowship as the status contrast did not make a difference to Krishna.

 

Love for brother

Lord Krishna and Balaram

 

Love for Brother

Balaram and Krishna shared a strong bonding , in which Krishna adored his sibling beyond all doubt. Krishna exceptionally regarded his elder sibling Balaram and they enjoyed a daring early life .These affection lessons to gain from Lord Krishna are extremely remarkable in reality, because of their effect on the Indian masses.

 

May 06 2017

कुंडली मिलान से नहीं, इसे मिलाकर करें विवाह, वरना 36 गुण मिलने पर भी होगा तलाक..!

 

कुंडली मिलान से नहीं, इसे मिलाकर करें विवाह, वरना 36 गुण मिलने पर भी होगा तलाक..!

 

विवाह मानव जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है। इस संस्कार मे बंधने से पूर्व वर एवं कन्या के जन्म नामानुसार गुण मिलान करके की परिपाटी है। गुण मिलान नहीं होने पर सर्वगुण सम्पन्न कन्या भी अच्छी जीवनसाथी सिद्ध नहीं होगी। गुण मिलाने हेतू मुख्य रूप से अष्टकूटों का मिलान किया जाता है। ये अष्टकूट है,  वर्ण, वश्य, तारा, योनी, ग्रहमैत्री,गण, राशि, नाड़ी।

विवाह के लिए भावी वर-वधू की जन्म-कुंडली मिलान करते नक्षत्र मेलापक के अष्टकूटों

(जिन्हे गुण मिलान भी कहा जाता है) में नाडी को सबसे महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है।

नाड़ी जो कि व्यक्ति के मन एवं मानसिक ऊर्जा की सूचक होती है। व्यक्ति के निजी सम्बंध उसके मन एवं उसकी भावना से नियंत्रित होते हैं, जिन दो व्यक्तियों में भावनात्मक समानता, या प्रतिद्वंदिता होती है, उनके संबंधों में ट्कराव पाया जाता है।

जैसे शरीर के वात, पित्त एवं कफ इन तीन प्रकार के दोषों की जानकारी कलाई पर चलने वाली नाड़ियों से प्राप्त की जाती है, उसी प्रकार अपरिचित व्यक्तियों के भावनात्मक लगाव की जानकारी आदि, मध्य एवं अंत्य नाम की इन तीन प्रकार की नाड़ियों के द्वारा मिलती है।

वैदिक ज्योतिष अनुसार आदि, मध्य तथा अंत्य- ये तीन नाड़ियां यथाक्रमेण आवेग, उद्वेग एवं संवेग की सूचक हैं, जिनसे कि संकल्प, विकल्प एवं प्रतिक्रिया जन्म लेती है। मानवीय मन भी कुल मिलाकर संकल्प, विकल्प या प्रतिक्रिया ही करता है और व्यक्ति की मनोदशा का मूल्यांकन उसके आवेग, उद्वेग या संवेग के द्वारा होता है।

इस प्रकार मेलापक में नाड़ी के माध्यम से भावी दम्पती की मानसिकता, मनोदशा का मूल्यांकन किया जाता है। वैदिक ज्योतिष के मेलापक प्रकरण में गणदोष, भकूटदोष एवं नाड़ी दोष- इन तीनों को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है। यह इस बात से भी स्पष्ट है कि ये तीनों कुल 36 गुणों में से (6+7+8=21) कुल 21 गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं और शेष पांचों कूट (वर्ण, वश्य, तारा, योनि एवं ग्रह मैत्री) कुल मिलाकर

(1+2+3+4+5=15) 15 गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अकेली नाड़ी के

8 गुण होते हैं, जो वर्ण, वश्य आदि 8 कूटों की तुलना में सर्वाधिक हैं, इसलिए मेलापक में नाड़ी दोष एक महादोष माना गया है।

नाड़ी दोष :- नाड़ी दोष होने पर यदि अधिक गुण प्राप्त हो रहें हो तो भी गुण मिलान को सही माना जा सकता, अन्‍यथा उनमें व्यभिचार का दोष पैदा होने की सभांवना रहती है। मध्य नाड़ी को पित स्वभाव की मानी गई है। इस लिए मध्य नाड़ी के वर का विवाह मध्य नाड़ी की कन्या से हो जाए तो उनमे परस्पर अंह के कारण सम्बंन्ध अच्छे नहीं बन पाते। उनमें विकर्षण कि सभांवना बनती है। परस्पर लड़ाई -झगड़े होकर तलाक की नौबत आ जाती है। विवाह के पश्चात् संतान सुख कम मिलता है। गर्भपात की समस्या ज्यादा बनती है।

अन्त्य नाड़ी को कफ स्वभाव की मानी इस प्रकार की स्थिति मे प्रबल नाड़ी दोष होने के कारण विवाह करते समय अवश्य ध्यान रखें, जिस प्रकार वात प्रकृ्ति के व्यक्ति के लिए वात नाड़ी चलने पर, वात गुण वाले पदार्थों का सेवन एवं वातावरण वर्जित होता है, अथवा कफ प्रकृ्ति के व्यक्ति के लिए कफ नाड़ी के चलने पर कफ प्रधान पदार्थों का सेवन एवं ठंडा वातावरण हानिकारक होता है, ठीक उसी प्रकार मेलापक में वर-वधू की एक समान नाड़ी का होना, उनके मानसिक और भावनात्मकताल-मेल में हानिकारक होने के कारण वर्जित किया जाता है।

तात्पर्य यह है कि लड़का- लड़की की एक समान नाड़ियां हों तो उनका विवाह नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनकी मानसिकता के कारण, उनमें आपसी सामंजस्य होने की संभावना न्यूनतम और टकराव की संभावना अधिकतम पाई जाती है, इसलिए मेलापक में आदि नाड़ी के साथ आदि नाड़ी का, मध्य नाड़ी के साथ मध्य का और अंत्य नाड़ी के साथ अंत्य का मेलापक वर्जित होता है। जब कि ल़ड़का-लड़की की भिन्न-भिन्न नाड़ी होना उनके दाम्पत्य संबंधों में शुभता का द्योतक है। यदि वर एवं कन्या कि नाड़ी अलग-अलग हो तो नाड़ी शुद्धि मानी जाती है। यदि वर एवं कन्या दोनों का जन्म यदि एक ही नाड़ी मे हो तो नाड़ी दोष माना जाता है। सामान्य नाड़ी दोष होने पर ये उपाय दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने का प्रयास कर सकते हैं।

1- आदि नाड़ी- अश्विनी, आर्द्रा पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी,हस्ता, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा, पुर्वाभाद्रपद

2- मध्य नाड़ी- भरणी, मृगशिरा, पुष्य, पुर्वाफाल्गुनी,चित्रा, अनुराधा, पुर्वाषाढा, धनिष्ठा, उत्तरासभाद्रपद।

3-अन्त्य नाड़ी- कृतिका, रोहिणी, अश्लेशा, मघा, स्वाति, विशाखा, उत्तराषाढा, श्रवण, रेवती आदि मध्य व अन्त्य नाड़ी का यह विचार सर्वत्र प्रचलित है, लेकिन कुछ स्थानों पर चर्तुनाड़ी एवं पंचनाड़ी चक्रभी प्रचलित है, लेकिन व्यावहारिक रुप से त्रिनाड़ी चक्र ही सर्वथा उपयुक्त जान पड़ता है।

नाड़ी दोष को इतना अधिक महत्व क्यों दिया गया है, इसके बारे मे जानकारी हेतू त्रिनाड़ी स्वभाव की जानकारी होनी आवश्‍यकत है।आदि नाड़ी वात् स्वभाव की मानी गई है, मध्य नाड़ी पित स्वभाव की मानी गई है, जबकि मध्य नाड़ी पित् प्रति एवं अन्त्य नाड़ी कफ स्वभाव की। यदि वर एवं कन्या की नाड़ी एक ही हो तो नाड़ी दोष माना जाता है। इसका प्रमुख कारण यही है कि वात् स्वभाव के वर का विवाह यदि वात् स्वभाव की कन्या से हो तो उनमे चंचलता की अधिकता के कारण समर्पण व आकर्षण की भावना विकसित नहीं होती।

विवाह के पश्‍चात् उत्पन्न संतान मे भी वात सम्भावना रहती है। इसी आधार पर आद्य नाड़ी वाले वर का विवाह आद्य नाड़ी की कन्या से वर्जित माना गया है, अन्यथा उनमें व्याभिचार का दोष पैदा होने की संभावना रहती है। मध्य नाड़ी को पित् स्वभाव की मानी गई है, इसलिए मध्य नाड़ी के वर का विवाह मध्य नाड़ी की कन्या से हो जाए तो उनमें परस्पर अहं के कारण सम्बंन्ध अच्छे नहीं बन पाते, उनमें विकर्षण की सम्भावना बनती है। परस्पर लड़ाई-झगड़े होकर तलाक की नौबत आ जाती है।

विवाह के पश्चात् संतान सुख कम मिलता है। गर्भपात की समस्या ज्यादा बनती है अन्त्य नाड़ी को कफ स्वभाव की मानी गई है, इसलिए अन्त्य नाड़ी के वर का विवाह यदि अन्त्य नाड़ी की महिला से हो तो उनमें कामभाव की कमी पैदा होने लगती है। शान्त स्वभाव के कारण उनमे परस्पर सामंजस्य का अभाव रहता है। दांपत्‍य मे गलतफहमी होना भी स्वभाविक होती है। नाड़ी होने पर विवाह न करना ही उचित माना जाता है। लेकिन नाड़ी दोष परिहार की स्थिति में यदि कुण्डली मिलान उत्तम बना रहा है, तो विवाह किया जा सकता है।

नाड़ी दोष परिहार

:-क)  वर कन्या की एक राशि हो, लेकिन जन्म नक्षत्र अलग-अलग हों या जन्म नक्षत्र एक ही हों परन्तु राशियां अलग हो तो नाड़ी नहीं होता है, यदि जन्म नक्षत्र एक ही हो, लेकिन चरण भेद हो तो अति आवश्यकता अर्थात् सगाई हो गई हो, एक दूसरे को पंसद करते हों तब इस स्थिति मे विवाह किया जा सकता है।

ख) विशाखा, अनुराधा, धनिष्ठा, रेवति, हस्त, स्वाति, आद्र्रा, पूर्वाभद्रपद इन 8 नक्षत्रों में से किसी नक्षत्र मे वर कन्या का जन्म हो तो नाड़ी दोष नहीं रहता है

ग) उत्तराभाद्रपद, रेवती, रोहिणी, विषाख, आद्र्रा, श्रवण, पुष्य, मघा, इन नक्षत्र में भी वर कन्या का जन्म नक्षत्र पड़े तो नाड़ी दोष नही रहता है। उपरोक्त मत कालिदास का है

घ) वर एवं कन्या के राशिपति यदि बुध, गुरू, एवं शुक्र में से कोई एक अथवा दोनों के राशिपति एक ही हो तो नाड़ी दोष नहीं रहता है।

ङ) ज्योतिष के अनुसार-नाड़ी दोष विप्र वर्ण पर प्रभावी माना जाता है। यदि वर एवं कन्या दोनो जन्म से विप्र हो तो उनमें नाड़ी दोष प्रबल माना जाता है। अन्य वर्णो पर नाड़ी पूर्ण प्रभावी नहीं रहता। यदि विप्र वर्ण पर नाड़ी दोष प्रभावी माने तो नियम का हनन होता हैं। क्योंकि बृहस्पति एवं शुक्र को विप्र वर्ण का माना गया हैं। यदि वर कन्या के राशिपति विप्र वर्ण ग्रह हों, तो इसके अनुसार नाड़ी दोष नहीं रहता। विप्र वर्ण की राशियों में भी बुध व शुक्र राशिपति बनते हैं।

च) सप्तमेश स्वगृही होकर शुभ ग्रहों के प्रभाव में हो तो एवं वर कन्या के जन्म नक्षत्र चरण में भिन्नता हो तो नाड़ी दोष नही रहता है। इन परिहार वचनों के अलावा कुछ प्रबल नाड़ी दोष के योग भी बनते हैं, जिनके होने पर विवाह न करना ही उचित हैं।

यदि वर एवं कन्या की नाड़ी एक हो एवं निम्न में से कोई युग्म वर कन्या का जन्म नक्षत्र हो तो विवाह न करें ।

अ) आदि नाड़ी- अश्विनी-ज्येष्ठा, हस्त- शतभिषा, उ.फा.-पू.भा. अर्थात् यदि वर का नक्षत्र अश्विनी हो तो कन्या नक्षत्र ज्येष्ठा होने पर प्रबल नाड़ी दोष होगा। इसी प्रकार कन्या नक्षत्र अश्विनी हो तो वर का नक्षत्र ज्येष्ठा होने पर भी प्रबल नाड़ी दोष होगा। इसी प्रकार आगे के युग्मों से भी अभिप्राय समझें।

आ) मध्य नाड़ी – भरणी-अनुराधा, पूर्वाफाल्गुनी-उतराफाल्गुनी, पुष्य-पूर्वाषाढा, मृगशिरा-चित्रा,चित्रा-धनिष्ठा,मृगशिरा-धनिष्ठा।

इ) अन्त्य नाड़ी – कृतिका-विशाखा, रोहिणी-स्वाति, मघा-रेवती; इस प्रकार की स्थिति में प्रबल नाड़ी दोष होने के कारण विवाह करते समय अवश्य ध्यान रखें।

सामान्य नाड़ी दोष होने पर किस प्रकार के उपाय दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने का प्रयासकर सकते हैं।

आइए जाने-नाड़ी दोष उपाय

1- वर एवं कन्या दोनों मध्य नाड़ी मे उत्पन्न हो तो पुरुष को प्राण भय रहता है। इसी स्थिति मे पुरुष को महामृत्यंजय जाप करना यदि अतिआवश्यक है। यदि वर एवं कन्या दोनो की नाड़ी आदि या अन्त्य हो तो स्त्री को प्राणभय की सम्भावना रहती है, इसलिए इस स्थिति मे कन्या महामृत्युजय अवश्य करे।

2- नाड़ी दोष होने पर संकल्प लेकर किसी ब्राह्यण को गोदान या स्वर्णदान करना चाहिए 3- अपनी सालगिराह पर अपने वजन के बराबर अन्न दान करें, एवं साथ मे ब्राह्मण भोजन कराकर वस्त्र दान करें

4- नाड़ी दोष के प्रभाव को दूर करने के लिए अनुकूल आहार दान करें। अर्थात् आयुर्वेद के मतानुसार जिस दोष की अधिकतम बने उस दोष को दूर करने वाले आहार का सेवन करें 5- वर एवं कन्या मे से जिसे मारकेश की दशा चल रही हो उसको दशानाथ का उपाय दशाकाल तक अवश्य करना चाहिए।

अष्टकूट कारक   गुणों की संख्या

  1. Varna 1

  2. Vashya 2

  3. Tara 3

  4. Yoni 4

  5. Graha Maitrai 5

  6. Gana 6

  7. Bhakoot 7

  8. Nadi 8

Total      36

Nov 29 2016

Mangalwar (Tuesday) Vrat

Mangalwar (Tuesday) Vrat
(For acquiring courage and power to win over enemies).

 

The deity of this fast is Mangal (Mars) who is God of power, war and courage. He eradicates fear and enemies. By observing this fast poverty gets eradicated. Problems like blood pressure get cured. All worldly desires get gratified like gain of son, wealth, religion, fulfilment of wishes and also favour of government. By doing it continuously for 21 weeks one gets rid of all Mars related problems. Mangalwar (Tuesday) is considered the birth day of Lord Hanuman, therefore, one who performs this fast gets protection from Hanuman and gets rid of physical, supernatural or worldly troubles. This results in intellectual development and attainment of physical strength or stamina.

Method of Observing Mangalwar Vrat

This fast should be started from the first Tuesday of bright half of any of the months when Sun is in Uttarayana (from 15th January to 15th June). Minimum 21 or 45 fasts should be observed. On the day of fast one should follow Bramhcharya very strictly. Wear red clothes and offer red sandal, vermillion, red cloth, flowers of Gurhal (Bassia catiphoia), garland of red flowers, any food item made of jaggery and wheat to God. Donate sweets to boys whose age is less than 21 years. Have fruits during the fast. You can have food after Sun set but it should be saltless. The Udyapan (completion ceremony) that you shall be performing after observing the number of fasts that you wanted to, must include Homa with the wood of Khair (catechu) On the day of fasting one, five or 7 rosaries of following Mantra should be recited

Donate land and food to Brahmins. After reciting the Mantra you should also read Mangalwar Vrata Katha

Mantra

”Om Kraang Kreeng Kraung Krang Bhaumay Namah”

Aarti Shri Hanuman Ji Ki

 

arti kijai hanuman lala ki| dusht dalan raghunath kala ki ||
jake bal se girivar kanpai| rog-dosh jake nikat n jhankai ||
anjni putra maha baldai| santan ke prabhu sada sahai ||
de bira raghunath pathaye| lanka jari siya sudhi laye ||
lanka so kot samudra si khai| jat pavnsut bar n lai ||
lanka jari asur sanhare| siyaram ji ke kaj sanvare ||
lakshman murchit pare sakare|ani sanzivan pran ubare ||
paithi patal tori jam-kare| ahiravan ki bhuja ukhare ||
bayen bhuja asur dal mare| dahine bhuja santajan tare ||
sur nar muni arti utare| jai jai jai hanuman uchare ||
kanchan thar kapur lau chai| arti karat anjna mai ||
jo hanuman ji ki arti gavai| basi baikunth paramapad pavai ||

Shri Hanumat Vandana

atulitbldhaman hemshailabhdehan danujvnkrishanun gyaninamagraganyam|
saklgunnidhanan vanranamdhishan raghuptipriyabhaktan vatjatan namami ||

Oct 15 2016

Biography-Famous Astrologer Acharya Satish Awasthi

Biography of famous Astrologer & India’s First Voice Reader

Dr. Acharya Satish Awasthi

biography famous astrologer acharya satish awasthi

Acharya Satish Awasthi

प्रख्यात ज्योतिष् आचार्य सतीश अवस्थी जी की प्रेरणादायक जीवनी

 

 

शहर के जाने माने ज्योतिषी (Astrologer) आचार्य डा.सतीश अवस्थी जी का जन्म  22 दिसंबेर 1982 को

कानपुर में हुआ लेकिन कुछ पारिवारिक मजबूरियों के चलते उनका पालन पोषण और शिक्षा-दीक्षा ननहिहाल

(मलिहाबाद,कशमरी) में हुई| हालाँकि वहाँ पर अपनापन मिला, परंतु उनके मन में ये बात रहती थी की वह

मामा मामी पर बोझ है| अतः उन्होने घरेलू कामों मे निपुणता हासिल करली ताकि किसी को कोई शिकायत ना

हो|

आचार्य जी का कहना है की वह बचपन में ही संस्कृत के श्लोक बिना रुके बोल लिया करते थे| श्लोक उन्हें

एक बार में ही याद हो जाया करते थे| इसपर अध्यापकोंको बड़ा आश्चर्य हुआ करता था|संस्कृत मे उनकी

पढ़ाई चली| वह बताते है की ननहिहल में ही मौंटेसरी स्कूल से कक्षा पाँचवी तक पढ़ाई पूरी कर वह सीतापुर

नैमिषारण्य गये और संस्कृत में प्राथमा : (कक्षा 6,7,8) तक की पड़ाई पूरी की| इसके बाद इलाहाबाद महर्षि

योगी संस्थान से  संस्कृत में (कक्षा-9,10,11,12) पड़ाई की|

काशी विश्वविद्यालय वाराणसी से शास्त्री (स्नातक) और आचार्य (परास्नातक) करने के बाद बनारस हिंदू विश्व-

विद्यालय से पी.एच.डी कर ज्योतिषी की उपाधि प्राप्त की| पढ़ाई का खर्चा पूरा करने के लिए उन्हे दूसरो की

थीसिस भी लिखनी पढ़ी| उनका दावा है कि वह खेल- खेल में  ही लोगों का हाथ देखकर कुछ सलाह दे दिया

करते थे, जिससे लोगों को फ़ायदा होता था| उनका यह दावा भी है की उनकी कुछ भविष्यवाणी सही साबित

हुई है| श्री अवस्थी कहते है की उन्होने एक साल तक एक -एक महीने के लिए 12 ज्योतिर्लींगों की उपासना

की| भगवान की तपस्या करने के उपरांत उन्होने अन्न ग्रहण नही किया|  इसी के साथ 51 महीने तक देश

भर में मौजूद 51 शक्ति पीठ भगवती आराधना की| यहाँ भी एक – एक महीने का मास परायण किया|

महाराष्‍ट्र में मौजूद आठ अष्टविनायक मंदिरो में एक-एक गणपति यज्ञ| यह सभी कार्य सामाजिक उत्थान के

लिए भी किए|

श्री अवस्थी जी के अनुसार वह ज्योतिष् शोध के लिए ज्योतिष् रत्न, ज्योतिष् यज्ञ यज्ञ महामहोपाध्याय, ज्योतिष्

प्रभाकर, भविष्यदृष्टा,ज्योतिष् ऋषि आदि सम्मान से 25 देशो में सम्मानित हो चुके है| अब उनका एक ही

सपना है कि उनका अपना अस्पताल हो जिसमे एलोपैथी,होम्योपैथी,नैचुरोपैथी ज्योतिष् नाम की सिम्पैथि जुड़

जाए तो मरीज को जल्द ठीक काइया जा सकता है| ज्योतिष् में हर समस्या का समाधान है|

biography famous astrologer satish awasthi

acharya satish ji

आचार्य जी से बातचीत के कुछ महत्वपूर्ण अंश:-

प्र. सफलता में ज्योतिष का कितना योगदान हो सकता है?

उ. जिस तरह से अँधेरे में लाइट की जरूरत होती है उसी तरह से ज्योतिष भी हमें सफलता का मार्ग दिखता

    है लेकिन हमें कर्म करना पड़ेगा। यह तो केवल सकारात्मक विचार विकसित करता है।   

                     

प्र. हस्तरेखाओं द्वारा बताये गए भविष्य कितने सटीक होते है?

उ. सौ प्रतिशत। बशर्ते हस्तरेखा बताने वाला सटीक होना चाहिए। आजकल ज्योतिष विद्या में सटीक जानकारों

    की कमी है।      

                  

प्र. स्टोन या रत्न किसी को लाभ पहुँचाने में किस तरह कम करते है?

उ. स्टोन रक्त के संचार से कम करते है। सूर्य की 24 किरनें होती है उसमे से एक है औषमिक किरण जो रत्न

पर पड़ती है और रत्न का रक्त संचार के आधार पर हमारी मानसिक तरंगो को मजबूर कर हमारे अंदर

सकारात्मक सोच विकसित करता है। रत्न कभी भी बिना सलाह के नहीं पहनना चाहिए। यह औषधि की तरह

काम करता है।          

              

प्र. क्या एक समय पर एक साथ जन्में लोगों की जिंदगी या करियर सामान रूप से संतुष्टि भरा या सफल हो  

    सकता है?                        

उ. नहीं। क्योकि हर व्यक्ति का अपना पुनर्जन्म निर्धारित होता है। जन्म का स्थान अलग-अलग होता है।

    सभी की किस्मत एक जैसी नहीं होती ।

प्र. ज्योतिष के आधार पर की गयी भविष्यवाणी हमेशा सही क्यों नहीं होती?                        

उ. यह एक विवादस्पद स्तिथि है। क्योंकि ज्योतिष में की गयी भविष्यवाणी कौन कर रहा है,यह देखना

जरुरी है। अगर किसी अनुभवी  और पढ़े-लिखे ज्योतिषी ने भविष्यवाणी सही तरीके से की है तो सच होगी।                        

प्र. क्या ज्योतिष का सहारा व्यक्ति को अन्धविश्वासी नहीं बनता और उसके प्यासों में कमी नहीं लाता कि अब  

    तक तो ज्योतिष उपाय कर ही रहे है, काम बन ही जाएगा?                    

उ. देखिये, एक एमबीबीएस,एमडी डाक्टर होता है और एक झोलाछाप। दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। ठीक

उसी तरह ज्योतिष विद्या में भी होता है। इस क्षेत्र में भी ज्योतिष विद्या के जानकार होते है और कुछ जानकार

होने का दिखावा करते है लेकिन ज्योतिष अन्धविश्वास नहीं है। यह आप में सकारात्मक दृष्टी पैदा कर आपको

आगे बढने के लिए प्रोत्साहित करता है। अगर ज्योतिष खराब होता तो न जाने कब का ख़त्म हो गया होता

लेकिन यह बढ़ रहा है। हो सकता है जिसे आप अन्धविश्वास कह रहे है वह विश्वास हो।   

                     

प्र. करियर के रूप में ज्योतिष अपनाने पर किन-किन बातों का ध्यान रखना पड़ेगा?                        

उ. इसके लिए शिक्षित ज्योतिष के पास जाये। ज्योतिष के आधार पर क्या करना चाहिए?

    कहाँ जाना चाहिए? कब सफलता मिलेगी? आदि बातों पर विचार करें। करियर के लिए किसी भी

    ज्योतिष से ज्योतिष के दशम भाव के बारे में पूछें। क्योंकि करियर के लिए ज्योतिष का दशम भाव ही बना     है।

                        

प्र. वर्तमान में ज्योतिष और ज्योतिषियों की स्थिति पर कुछ कहना चाहेंगे?                        

उ. पहले से ठीक है। प्रचार-प्रसार हुआ है लेकिन ज्योतिषियों की स्थिति खराब हुई है। शोध की नितांत

    आवश्यकता है। पढ़ाई- लिखाई होनी चाहिए। ढोंगी ज्योतिषियों से बचे। पढ़े-लिखे ज्योतिषियों से ही परामर्श

    ले। वैसे ज्योतिषियों की भीड़ ज्यादा है। अच्छे ज्योतिषी तलाशना मुश्किल होता है।

 

प्र. किसी भी ज्योतिष् से परामर्श लेने से पहले उनके व्यक्तिव का आंकलन कैसे करना चाहिये?

उ. आज कल सटीक ज्योतिष् परामर्श की भारी कमी दिखाई पड़ती है, अक्सर लोग बड़े नाम सुनकर या

किसी के सलाह पर ढोंगी ज्योतिषों के चक्कर काटते है और बाद में उनको पछताना पड़ता है| ऐसी स्तिथि से

बचने के लिए आपको स्वयं विश्लेषण करना चाहिए| एक सच्चा और  सटीक ज्योतिषी आपको कभी डराएगा

नहीं, वह आपको धैर्यता से सभी पूछे गये सवालो का जवाब देगा और आपको उसमें मित्र नज़र आएगा| जिस

प्रकार सभी मनुष्य एक से नहीं होते उसी प्रकार ज्योतिषियो में भी कुछ अच्छे तो कुछ बुरे भी हो सकते है|

 

प्र. आपको कब ज्ञात हुआ आप Voice Reading कर सकते है?

उ. 14 साल की उमर में मैने पहली Voice Reading की| अगर आप अपना जन्म का दिन नहीं जानते या

टाइम नहीं जानते इसके बावज़ूद केवल Voice Reading के माध्यम से आपकी जिंदगी से जुड़ी काफ़ी बातें

एवं सुझाव आपको बताए जा सकते  है|

 

 

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Jul 11 2016

Astrological tips: Before getting married

The matchmaking astrology essentially deals with flawless and scrupulous matching of the birth horoscopes of the two concerned persons.

 

astrological tips for marriage

Indian marriage

Compatibility between partners is a very significant point to consider before taking the plunge into marriage. To avoid broken marriages, check the zodiac signs and choose the right astrology advisors, says an expert.

Matchmaking Vedic Astrology has gained prominence lately as it offers various tools and remedies for promoting happy, prosperous and stable marriages.

The matchmaking astrology essentially deals with flawless and scrupulous matching of the birth horoscopes of the two concerned persons. Guna Milan, Manglik analysis, analysis of other Doshas and Yogas and all are some of its time-tested methods of astrology through which it provides its recommendation to be followed before finalizing any matrimonial alliance.

 

Here are some tips by Acharya Satish Awasthi Ji, an expert at astrology site Lovewithastrology.com, for a blissful married life:

Apart from zodiac signs, compatibility of several other elements is essential:

Zodiac signs consist of only one aspect of Guna Milan or Vedic method of horoscope matching. Zodiac signs may indicate about basic inclinations and tendencies, but several other factors like birth chart and Dasha are required to be considered before predicting anything with greater certainty during the course of match-making for marriage.

Key points to consider while horoscope matching of the prospective couples:

According to Ashtakoota system, there are eight different aspects that are judged during the matchmaking which include mental compatibility, sexual compatibility, understanding and behavior. As per Vedic Astrology, all these aspects should be compatible for a peaceful, promising and enjoyable married life. All these different aspects hold different points summing up to 36 and minimum points required for an agreeable marriage to take place is 18.

Choosing the right astrology advisers :

Marriage is an important milestone in one’s life and so, it should be done with proper understanding. The most pivotal thing to take care about is proper calculations and in-depth analysis. If these two things are taken care of, a good life is almost assured.

 

Jun 22 2016

Astrology: What Your Zodiac Sign Says About Your Creative Side

“Everybody is creative—you’re wrong if you think you’re not, Acharya ji Explains. “It can be as simple as how you relate to others, to food, to your body, to how you tidy up your house. Following your natural rhythm and passion makes creativity easy.”

 

 

What Your Sign Says About Your Creativity

WATER: Cancer, Scorpio, Pisces

Water signs like poetry, music, taking care of the house, parenting/caretaking, and food (they’re really into cooking). They cater to others with true, effortless, passion, and this is a way of being creative.

As yogis, water people love to be fluid. They also love quiet, meditation, and being alone. Water signs need to allow themselves time to be alone or with the very few people they love, rather than feeling guilty about not socializing. Their creativity occurs when they’re alone or with their inner circle.

 

AIR: Gemini, Libra, Aquarius

Air people are creative with words and relationships. They love writing, journaling, listening to and collecting information, and going on the internet to study things. They’re into clothing and design, and they have eccentric and eclectic taste. Air people love to plan, which makes them great directors. They need someone to play with though—their creativity requires partnership.

Air people love to dabble in multiple styles of yoga. They need to change it up to stay creatively inspired. They’re the students not following the teacher in class and doing their own thing. They love to take classes and go on retreats, and they love teaching.

EARTH: Taurus, Virgo, Capricorn

Earth signs love making things, building things, making plans, cleaning, organizing, woodwork, and managing money.

As yogis, they love structure and form. Their creativity comes out of being really disciplined and organized. They’re the ones cleaning the yoga studio and decorating it with sacred objects or adjusting the lighting and the music in the room before class.

 

FIRE: Aries, Leo, Sagittarius

Fire signs love wild expression, from singing to dancing to being superstars athletically to wearing flashy clothing. Anything that puts them centerstage and gets them attention.

As yogis, fire signs like loud music and tend to breathe and chant loudly during class. They are competitive, standing in front of the room in the loudest, flashiest leggings and showing off in Handstand even when the teacher says don’t do Handstand. They can’t help it.

Jun 09 2016

There is a connection between ‪#‎Astrology‬ and your energetic field – The Astrology of the Chakras

There is a connection between ‪#‎Astrology‬ and your energetic field – The Astrology of the Chakras

It is well known to many of us by now that the “human energy field” is comprised of seven major energy centers or chakras that are located along the cerebral-spinal axis. Each of these centers acts as a substation or transformer of the universal energy or prana that flows through the medulla at the base of the skull. As the prana descends through the five lower chakras it is transformed or modified from it’s pure state. If the lower chakras are clear and free of negative impressions (trauma, suppression, etc.) then the prana is free to ascend back to the upper chakras leading to higher states of consciousness.

If the lower chakras are blocked, however, then the prana is blocked from ascending and these energetic blockages begin to manifest as “dis-ease” on mental, emotional and physical levels. In other words, if we have blockages in any of the chakras it means we have broken our “attune”-ment with universal life force energy on a subtle, or not so subtle, level. Since the chakras are energy centers that respond to vibration, one of the ways that we can come back into alignment or attunement is through the conscious use of vibration, music and movement.

One of the tools that can help us in this journey is an understanding, through the use of astrology, of the relationship between the chakras and the planets. In the astrological world each of the chakras is associated with or is governed by a different planet. On an energetic level the astrological chart is a map of not only the inter-relationship of the planets but a map of the inter-relationship and condition of the chakras. In essence, we have our own inner solar system that guides the evolution of our consciousness through the various chakra centers. By understanding the planetary quality of each chakra we can use specific forms of music, vibration and movement to awaken and open each chakra and energize ourselves.

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