जाने कहां स्थित हैं भगवान शिव के पवित्र ज्योतिर्लिंग

जाने कहां स्थित हैं भगवान शिव के पवित्र ज्योतिर्लिंग
जाने कहां स्थित हैं भगवान शिव के पवित्र ज्योतिर्लिंग

भगवान शिव के कुल बारह ज्योतिर्लिंग हैं 

सोमवार को भगवान शिव के विशेष स्थान ज्योतिर्लिंगों में भारी भीड़ उमड़ती है। ये पवित्र शिवलिंग पूरे देश में प्रतिष्ठित हैं और इनकी कुल संख्या बारह है। भगवान शिव के इन ज्योतिर्लिंग को प्रकाश लिंग भी कहा जाता है। ये पूजा के लिए भगवान शिव के पवित्र धार्मिक स्थल और केंद्र हैं। शिव को स्वयम्भू के रूप में भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है स्वयं उत्पन्न। आइये जानें ये कहां हैं। 

ज्योतिर्लिंग के स्थान

पहला स्थान: सोमनाथ यह ज्योतिर्लिंग गुजरात के काठियावाड़ में स्थापित है।

दूसरा स्थान: श्री शैल मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग मद्रास में कृष्णा नदी के किनारे पर्वत पर स्थापित है।

तीसरा स्थान: ये महाकाल उज्जैन के अवंति नगर में स्थापित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग। कहते हैं यहां शिवजी ने दैत्यों का नाश किया था।

चौथा स्थान: मान्यता है कि ॐकारेश्वर मध्यप्रदेश के धार्मिक स्थल ओंकारेश्वर में नर्मदा तट पर पर्वतराज विंध्य की कठोर तपस्या से खुश होकर शिव वरदान देने हुए प्रकट हुए थे जिसके बाद यहां ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापित हुआ।

पांचवां स्थान: नागेश्वर गुजरात के द्वारकाधाम के निकट स्थापित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग।

छठवां स्थान: बैजनाथ बिहार के बैद्यनाथ धाम में स्थापित ज्योतिर्लिंग।

सातवां स्थान: भीमाशंकर महाराष्ट्र की भीमा नदी के किनारे स्थापित भीमशंकर ज्योतिर्लिंग।

आठवां स्थान: त्रर्यंम्बकेश्वर नासिक से 25 किलोमीटर दूर त्र्यंम्बकेश्वर में स्थापित ज्योतिर्लिंग।

नवां स्थान: घुमेश्वर महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में एलोरा गुफा के पास वेसल गांव में स्थापित घुमेश्वर ज्योतिर्लिंग।

दसवां स्थान:  हरिद्वार से 150 पर मिल दूर, केदारनाथ में हिमालय पर्वत पर स्थित केदारनाथ ज्योतिर्लिंग।

ग्यारहवां स्थान: बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग।

बारहवां स्थान: रामेश्वरम्‌ में त्रिचनापल्ली समुद्र तट पर भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग। 

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घर में पूजा का नियम, कैसी मूर्ति रखें व पूजन सामग्री से जुड़ी खास बातें

घर में पूजा का नियम, कैसी मूर्ति रखें व पूजन सामग्री से जुड़ी खास बातें
घर में पूजा का नियम, कैसी मूर्ति रखें व पूजन सामग्री से जुड़ी खास बातें

घर में रखें कैसी मूर्ति :

घर के मंदिर में ज्यादा बड़ी मूर्तियां नहीं रखनी चाहिए। शास्त्रों के अनुसार बताया गया है कि यदि हम मंदिर में शिवलिंग रखना चाहते हैं तो शिवलिंग हमारे अंगूठे के आकार से बड़ा नहीं होना चाहिए। शिवलिंग बहुत संवेदनशील होता है और इसी वजह से घर के मंदिर में छोटा सा शिवलिंग रखना शुभ होता है। अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी छोटे आकार की ही रखनी चाहिए। अधिक बड़ी मूर्तियां बड़े मंदिरों के लिए श्रेष्ठ रहती हैं, लेकिन घर के छोटे मंदिर के लिए छोटे-छोटे आकार की प्रतिमाएं श्रेष्ठ मानी गई हैं।

पूजा करते समय किस दिशा की ओर होना चाहिए अपना मुंह :

घर में पूजा करने वाले व्यक्ति का मुंह पश्चिम दिशा की ओर होगा तो बहुत शुभ रहता है। इसके लिए पूजा स्थल का द्वार पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। यदि यह संभव ना हो तो पूजा करते समय व्यक्ति का मुंह पूर्व दिशा में होगा तब भी श्रेष्ठ फल प्राप्त होते हैं।

मंदिर तक पहुंचनी चाहिए सूर्य की रोशनी और ताजी हवा :

घर में मंदिर ऐसे स्थान पर बनाया जाना चाहिए, जहां दिनभर में कभी भी कुछ देर के लिए सूर्य की रोशनी अवश्य पहुंचती हो। जिन घरों में सूर्य की रोशनी और ताजी हवा आती रहती है, उन घरों के कई दोष स्वत: ही शांत हो जाते हैं। सूर्य की रोशनी से वातावरण की नकारात्मक ऊर्जा खत्म होती है और सकारात्मक ऊर्जा में बढ़ोतरी होती है।

पूजन के बाद पूरे घर में कुछ देर बजाएं घंटी :

यदि घर में मंदिर है तो हर रोज सुबह और शाम पूजन अवश्य करना चाहिए। पूजन के समय घंटी अवश्य बजाएं, साथ ही एक बार पूरे घर में घूमकर भी घंटी बजानी चाहिए। ऐसा करने पर घंटी की आवाज से नकारात्मकता नष्ट होती है और सकारात्मकता बढ़ती है।

पूजन सामग्री से जुड़ी खास बातें :

पूजा में बासी फूल, पत्ते अर्पित नहीं करना चाहिए। स्वच्छ और ताजे जल का ही उपयोग करें। इस संबंध में यह बात ध्यान रखने योग्य है कि तुलसी के पत्ते और गंगाजल कभी बासी नहीं माने जाते हैं, अत: इनका उपयोग कभी भी किया जा सकता है। शेष सामग्री ताजी ही उपयोग करनी चाहिए। यदि कोई फूल सूंघा हुआ है या खराब है तो वह भगवान को अर्पित न करें।

पूजन कक्ष में नहीं ले जाना चाहिए ये चीजें :

घर में जिस स्थान पर मंदिर है, वहां चमड़े से बनी चीजें, जूते-चप्पल नहीं ले जाना चाहिए। मंदिर में मृतकों और पूर्वजों के चित्र भी नहीं लगाना चाहिए। पूर्वजों के चित्र लगाने के लिए दक्षिण दिशा क्षेत्र रहती है। घर में दक्षिण दिशा की दीवार पर मृतकों के चित्र लगाए जा सकते हैं, लेकिन मंदिर में नहीं रखना चाहिए।

पूजन कक्ष के आसपास शौचालय नहीं होना चाहिए :

घर के मंदिर के आसपास शौचालय होना भी अशुभ रहता है। अत: ऐसे स्थान पर पूजन कक्ष बनाएं, जहां आसपास शौचालय न हो। यदि किसी छोटे कमरे में पूजा स्थल बनाया गया है तो वहां कुछ स्थान खुला होना चाहिए, जहां आसानी से बैठा जा सके।

रोज रात को मंदिर पर ढंकें पर्दा :

रोज रात को सोने से पहले मंदिर को पर्दे से ढंक देना चाहिए। जिस प्रकार हम सोते समय किसी प्रकार का व्यवधान पसंद नहीं करते हैं, ठीक उसी भाव से मंदिर पर भी पर्दा ढंक देना चाहिए। जिससे भगवान के विश्राम में बाधा उत्पन्न ना हो।

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शनि आमावस्या की पूजा, दान और मंत्र

शनि आमावस्या की पूजा, दान और मंत्र
शनि आमावस्या की पूजा, दान और मंत्र

शनि देव को नौ ग्रहों में न्याय का देवता माना जाता है।इस बार ज्येष्ठ मास की अमावस्या 3 जून 2019 को है। जिसे शनि जंयती के रूप में भी मनाया जाएगा। इस बार 3 जून 2019 की तिथि खास है क्योंकि आज के दिन शनि अमावस्या, सोमवती अमावस्या और वट सावित्रि व्रत तीनों ही हैं। शनि आमावस्या का दिन साढ़ेसाती , शनि की ढैया या महादशा से पीड़ित लोगों को राहत पहुंचाने के लिए एक विशेष दिन माना जाता है। अगर आप भी शनि देव की साढेसाती , ढैया या महादशा से परेशान है तो इस दिन शनिदेव की विधिवत पूजा करने से आप लाभ प्राप्त कर सकते हैं और अगर आपको यह नहीं पता है कि शनि अमावस्या के दिन कैसे पूजा करें, मंत्र और क्या दान करें तो आज हम आपको इन सब के बारे में बताएंगे। जानते हैं शनि आमावस्या की पूजा और दान और मंत्र के बारे में-

शनि अमावस्या पर इन चीजों का करें दान

1. शनि देव को काली चीजें अत्याधिक प्रिय है इसलिए शनि आमावस्या के दिन काली उड़द , काले तिल व तेल का दान अवश्य करें।

2. अगर आप किसी ऐसे रोग से पीड़ित है। जो ठीक नहीं हो रहा तो शनि अमावस्या के दिन लोहे के कटोरे में सरसों के तेल में अपना चेहरा देखकर दान करें ।

3.अगर आप शनि की साढ़ेसाती ,ढैय्या और महादशा से परेशान हैं तो किसी शनि मंदिर में किसी पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलांए और सरसो का तेल किसी निर्धन को दान दें।

4.अगर आपके पास धन की कमी हैं तो शनि अमावस्या के दिन किसी गरीब को कंबल दान करें।

5.धन प्राप्ति के लिए शनि अमावस्या के दिन शनिदेव को काले तिल के लड्डुओं का भोग लगांए।

शनि देव के मंत्र

1. ॐ शन्नोदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये शन्योरभिस्त्रवन्तु न:।

2. ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम:

3. ॐ ऐं ह्लीं श्रीशनैश्चराय नम:।

4. कोणस्थ पिंगलो बभ्रु: कृष्णो रौद्रोन्तको यम:।

सौरि: शनैश्चरो मंद: पिप्पलादेन संस्तुत:।।

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जाने स्वास्तिक चिन्ह का महत्व

जाने स्वास्तिक चिन्ह का महत्व
जाने स्वास्तिक चिन्ह का महत्व

एक दूसरे को काटती हुई दो रेखाओं और आगे चल कर उनके चारों सिरों के दांई ओर मुड़ जाने वाले चिह्न को स्वस्तिवाचन का प्रतीक माना जाता है। स्वास्तिक अति प्राचीन पुण्यप्रतीक है, जिसमें गूढ़ अर्थ और गंभीर रहस्य छुपे हैं।

स्वस्तिक जिस मंत्र के प्रतीक रूप में चित्रित किया जाता है, वह यजुर्वेद से लिया गया है। स्वस्ति न इंद्रो वृद्धश्रवा… भाग से शुरु होने वाले मंत्र के प्रतीक स्वस्तिक की पूर्व दिशा में वृद्धश्रवा इंद्र, दक्षिण में बृहस्पति इंद्र, पश्चिम में पूषा-विश्ववेदा इंद्र तथा उत्तर दिशा में अरिष्टनेमि इंद्र स्थित हैं।

तंत्रालोक में आचार्य अभिनव गुप्त ने स्वस्तिक का अर्थ करते हुए लिखा है कि नादब्रह्म से अक्षर तथा वर्णमाला बनी, मातृका की उत्पत्ति हुई। नाद से ही वाणी के चारों रूप पश्यंती, मध्यमा तथा वैखरी उत्पन्न हुई। फिर उनके भी स्थूल तथा सूक्ष्म, दो भाग बने। इस प्रकार नाद सृष्टि से छह रूप हो गए। 

इन्हीं छह रूपों में, पंक्तियों में स्वस्तिक का रहस्य छिपा है। अतः स्वस्तिक को समूचे नादब्रह्म तथा सृष्टि का प्रतीक एवं पर्याय माना जा सकता है। स्वस्तिक की यह आकृति दो प्रकार की हो सकती है। प्रथम स्वस्तिक, जिसमें रेखाएं आगे की ओर इंगित करती हुई दांई ओर मुड़ती हैं।

इसे स्वस्तिक कहते हैं। यही शुभ चिह्व है, जो हमारी प्रगति की ओर संकेत करता है। दूसरी आकृति में रेखाएं पीछे की ओर संकेत करती हुई बाईं ओर मुड़ती हैं। इसे वामावर्त स्वस्तिक कहते हैं। भारतीय संस्कृति में इसे अशुभ माना जाता है। 

भारतीय दर्शन के अनुसार स्वस्तिक की चार रेखाओं को चार वेद, चार पुरूषार्थ, चार आश्रम, चार लोक तथा चार देवों अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा गणेश से तुलना की गई हैं। जैन धर्म में स्वस्तिक उनके सातवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ के प्रतीक चिन्ह के रूप में लोकप्रिय है। 

ऋग्वेद की ऋचा में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं की उपमा दी गई है। सिद्धान्तसार ग्रन्थ में उसे विश्व ब्रह्माण्ड का प्रतीक चित्र माना गया है। 

उसके मध्य भाग को विष्णु की कमल नाभि और रेखाओं को ब्रह्माजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरूपित किया गया है। अन्य ग्रन्थों में चार युग, चार वर्ण, चार आश्रम एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार प्रतिफल प्राप्त करने वाली सामाजिक व्यवस्था एवं वैयक्तिक आस्था को जीवन्त रखने वाले संकेतों को स्वस्तिक में ओत-प्रोत बताया गया है। 

इस चिह्न की मीमांसा करते हुए स्वस्तिक शब्द का अर्थ (सु-अच्छा, अस्ति-सत्ता, क-कर्ता) अच्छा या मंगल करने वाला भी किया गया है। स्वस्तिक अर्थात कुशल एवं कल्याण। कल्याण शब्द का उपयोग तमाम प्रश्नों के एक उत्तर में किया जाता है। 

शायद इसलिए भी यह चिह्न मानव जीवन में इतना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। संस्कृत में सु-अस धातु से स्वस्तिक शब्द बनता है। सु अर्थात् सुन्दर, श्रेयस्कर, अस् अर्थात् उपस्थिति, अस्तित्व। जिसमें सौन्दर्य एवं श्रेयस का समावेश हो, वह स्वस्तिक है।

मांगलिक कार्यों में इसका उपयोग किया जाता है। मांगलिक कार्यों में इसका निर्माण करने के लिए सिन्दूर, रोली या कुंकुम लाल रंग का ही प्रयोग होता है। लाल रंग प्रेम, रोमांच व साहस को दर्शाता है। 

यह रंग लोगों के शारीरिक व मानसिक स्तर को शीघ्र प्रभावित करता है। यह रंग शक्तिशाली व मौलिक है। यह रंग मंगल ग्रह का है जो स्वयं ही साहस, पराक्रम, बल व शक्ति का प्रतीक है।

यह सजीवता का प्रतीक है और हमारे शरीर में व्याप्त होकर प्राण शक्ति का पोषक है। मूलतः यह रंग ऊर्जा, शक्ति, स्फूर्ति एवं महत्त्वाकांक्षा का प्रतीक है। शरीर में लाल रंग की कमी से अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

लाल रंग से ही केसरिया, गुलाबी, मैहरुन और अन्य रंग बनाए जाते हैं। इन सब तथ्यों से प्रमाणित होता है कि स्वस्तिक लाल रंग से ही अंकित किया जाना चाहिए या बनाना चाहिए। 

पुराणों में स्वस्तिक को विष्णु का सुदर्शन चक्र माना गया है। उसमें शक्ति, प्रगति, प्रेरणा और शोभा का समन्वय है। इन्हीं के समन्वय से यह जीवन और संसार समृद्ध बनता है।

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वट सावित्री व्रत पूजा-विधि

वट सावित्री व्रत पूजा-विधि
वट सावित्री व्रत पूजा-विधि

वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को मनाया जाता है। इस बार वट सावित्री का व्रत 03 जून 2019 (सोमवार) को है। वट सावित्री व्रत की कथा सत्यवान-सावित्री की कथा जुड़ी हुई है। जिसमें सावित्री ने अपने संकल्प और श्रद्धा से, यमराज से, सत्यवान के प्राण वापस ले लिए थे। वट सावित्री व्रत पर महिलाएं भी संकल्प के साथ अपने पति की आयु और प्राण रक्षा के लिए इस दिन व्रत और संकल्प लेती हैं। इस व्रत के परिणामस्वरूप सुखद और संपन्न दाम्पत्य जीवन का वरदान प्राप्त होता है। वट सावित्री का व्रत समस्त परिवार को एक सूत्र में बांधे भी रखता है।

  • प्रातःकाल घर की सफाई कर नित्य कर्म से निवृत्त होकर स्नान करें।
  • तत्पश्चात पवित्र जल का पूरे घर में छिड़काव करें।
  • इसके बाद बांस की टोकरी में सप्त धान्य भरकर ब्रह्मा की मूर्ति की स्थापना करें।
  • ब्रह्मा के वाम पार्श्व में सावित्री की मूर्ति स्थापित करें।
  • इसी प्रकार दूसरी टोकरी में सत्यवान तथा सावित्री की मूर्तियों की स्थापना करें। इन टोकरियों को वट वृक्ष के नीचे ले जाकर रखें।
  • पूजा में जल, मौली, रोली, कच्चा सूत, भिगोया हुआ चना, फूल तथा धूप का प्रयोग करें।
  • जल से वटवृक्ष को सींचकर उसके तने के चारों ओर कच्चा धागा लपेटकर तीन बार परिक्रमा करें।
  • इसके बाद ब्रह्मा तथा सावित्री का पूजन करें।

अब निम्न श्लोक से सावित्री को अर्घ्य दें : –

अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते।
पुत्रान्‌ पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥

  • तत्पश्चात सावित्री तथा सत्यवान की पूजा करके बड़ की जड़ में पानी दें।

इसके बाद निम्न श्लोक से वटवृक्ष की प्रार्थना करें –

यथा शाखाप्रशाखाभिर्वृद्धोऽसि त्वं महीतले।
तथा पुत्रैश्च पौत्रैश्च सम्पन्नं कुरु मा सदा॥

  • बड़ के पत्तों के गहने पहनकर वट सावित्री की कथा सुनें।
  • भीगे हुए चनों का बायना निकालकर, नकद रुपए रखकर सासुजी के चरण-स्पर्श करें।
  • यदि सास वहां न हो तो बायना बनाकर उन तक पहुंचाएं।
  • वट तथा सावित्री की पूजा के पश्चात प्रतिदिन पान, सिन्दूर तथा कुंमकुंम से सौभाग्यवती स्त्री के पूजन का भी विधान है। यही सौभाग्य पिटारी के नाम से जानी जाती है। सौभाग्यवती स्त्रियों का भी पूजन होता है। कुछ महिलाएं केवल अमावस्या को एक दिन का ही व्रत रखती हैं।
  • इस व्रत में सावित्री-सत्यवान की पुण्य कथा का श्रवण करें अथवा औरों को सुनाएं।
  • पूजा समाप्ति पर ब्राह्मणों को वस्त्र तथा फल आदि वस्तुएं बांस के पात्र में रखकर दान करें।

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नामकरण संस्कार: किस प्रकार किया जाना चाहिए

नामकरण संस्कार: किस प्रकार किया जाना चाहिए
नामकरण संस्कार: किस प्रकार किया जाना चाहिए

नामकरण संस्कार के बारे में स्मृति संग्रह में लिखा है-नामकरण संस्कार से आयु एवं तेज में वृद्धि होती है। नाम की प्रसिद्धि से व्यक्ति का लौकिक व्यवहार में एक अलग अस्तित्व उभरता है।

नामकरण संस्कार संपन्न करने के संबंध में अलग-अलग स्थानों पर समय की विभिन्नताएं सामने आई हैं। जन्म के 10वें दिन सूतिका का शुद्धिकरण यज्ञ कराकर नामकरण संस्कार कराया जाता है।

गोभिल गह्यसूत्रकार के अनुसार 100 दिन या 1 वर्ष बीत जाते के बाद भी नामकरण संस्कार कराने का प्रचलन है।

दो तरह के नाम रखने का विधान है। एक गुप्त नाम जिसे सिर्फ जातक के माता पिता जानते हों तथा दूसरा प्रचलित नाम जो लोक व्यवहार में उपयोग में लाया जाये। नाम गुप्त रखने का कारण जातक को मारक , उच्चाटन आदि तांत्रिक क्रियाओं से बचाना है। प्रचलित नाम पर इन सभी क्रियाओं का असर नहीं होता विफल हो जाती हैं।

गुप्त नाम बालक के जन्म के समय ग्रहों की खगोलीय स्थिति के अनुसार नक्षत्र राशि का विवेचन कर के रख जाता है। इसे राशि नाम भी कहा जाता है। बालक की ग्रह दशा भविष्य फल आदि इसी नाम से देखे जाते हैं। विवाह के समय जातक जातिकवों के कुंडली का मिलाप भी राशि नाम के अनुसार होता है। सही और सार्थक नामकरण के लिए बालक के जन्म का समय, जनक स्थान, और जन्म तिथि का सही होना अति आवश्यक है।

दूसरा नाम लोक प्रचलित नाम – योग्य ब्राह्मण या ऋषि बालक के गुणों के अनुरुप बालक का नामकरण करते हैं। जैसे राम, लक्षमण, भरत और शत्रुघ्न का गुण और स्वभाव देख कर ही महर्षि वशिष्ठ ने उनका नामकरण किया था। लेकिन आजकल यह लोक प्रचलित नाम सामान्यतः माता पिता नाना नानी के रूचि के अनुसार रख जाता है। इस नाम से बालक के व्यवसाय, व्यवसाय में किसी पुरुष से शत्रुता और मित्रता के ज्ञान के लिए किया जाता है।

गृह्यसुत्र के परामर्श के अनुसार
दशम्यामुत्थाप्य पिता नामकरनम करोति। इस सूत्र के अनुसार दसवें दिन सूतक निवृति के बाद नामकरण संस्कार कर देना चाहिए। किसी किसी ग्रन्थ में 100 वें दिन या एक वर्ष के अंदर इस संस्कार को करने का विधानहै।

गोभिल गृह्यसुत्र के अनुसार “जननादृशरात्रे व्युष्टे शतरात्रे संवत्सरे वा नामधेयकरणम्”
अर्थात जन्म के 10 वें दिन में 100 वें दिन में या 1 वर्ष के अंदर जातक का नामकरण संस्कार कर देना चाहिए।नामकरण-संस्कार के संबंध में स्मृति-संग्रह में निम्नलिखित श्लोक उक्त है-

आयुर्वेडभिवृद्धिश्च सिद्धिर्व्यवहतेस्तथा । नामकर्मफलं त्वेतत् समुद्दिष्टं मनीषिभिः ।।
अर्थात नामकरण-संस्कार से तेज़ तथा आयु की वृद्धि होती है। लौकिक व्यवहार में नाम की प्रसिद्धि से व्यक्ति का अस्तित्व बनता है।
इसके पश्चात् प्रजापति, तिथि, नक्षत्र तथा उनके देवताओं, अग्नि तथा सोम की आहुतियां दी जाती हैं। तत्पश्चात् पिता, बुआ या दादी शिशु के दाहिने कान की ओर उसके नाम का उच्चारण करते हैं। इस संस्कार में बच्चे को शहद चटाकर और प्यार-दुलार के साथ सूर्यदेव के दर्शन कराए जाते हैं।

इस अवसर पर कामना की जाती है कि बच्चा सूर्य की प्रखरता एवं ते‍जस्विता धारण करे। गुलाब की पंखुरियां उस पर बरसा कर स्वस्ति वाचन किया जाता है। ध्यान रखें बच्चे पर चावल न बरसाएं, छोटा बच्चा बहुत नाजुक होता है चावल से उसे परेशानी हो सकती है साथ ही आंख, कान में चावल जा सकते हैं।

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स्वप्न शास्त्र के अनुसार सपने में धार्मिक स्थल देखने का क्या अर्थ होता है

स्वप्न शास्त्र के अनुसार सपने में धार्मिक स्थल देखने का क्या अर्थ होता है
स्वप्न शास्त्र के अनुसार सपने में धार्मिक स्थल देखने का क्या अर्थ होता है

सपने में धार्मिक स्थल देखना : सपने भविष्य का आइना होते हैं। स्वप्न शास्त्र के अनुसार सपने भविष्य में होने वाली अच्छी और बुरी घटनाओं का सूचक होते हैं। कई बार हम ऐसे सपने देखते हैं। जिसे देखकर हम बैचेन हो उठते हैं और उनका मतलब भी जानना चाहते हैं। ऐसा ही स्वप्न है धार्मिक स्थल को लेकर। अगर आप इस स्वप्न के बारे में नही जानते तो आज हम आपको इसके बारे में बताएंगे। तो चलिए जानते हैं सपने में धार्मिक स्थल को देखने के बारे में

सपने में मंदिर देखना
सपने में यदि अगर मंदिर देखते हैं तो यह एक शुभ स्वप्न हैं। मंदिर के दर्शन हों या आप स्वयं मंदिर गए हों और वहां कुछ दान कर रहे हों तो यह असल जिंदगी में आ रही परेशानियो को दर्शाता है। ऐसा स्वप्न यह संकेत देता है कि व्यक्ति को खुद मंदिर जाकर दान-पुण्य करना चाहिए। साथ ही अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए भगवान को धन्यवाद करना चाहिए।

सपने में मस्जिद देखना
यदि आप सपने में मस्जिद देखते हैं तो यह एक बेहद ही शुभ स्वप्न है। अगर कोई व्यक्ति सपने में मस्जिद देखता है तो उसके जल्द ही उसके जीवन की परेशानियां समाप्त हो जाती है। इस सपने का एक और मतलब होता है। अगर कोई सपने में मस्जिद देखता है तो यह सपना बताता है कि उसके परिवार में किसी तरह की खुशी का आगमन होने वाला है या तो घर में किसी का विवाह हो सकता है या परिवार में किलकारियां गूंज सकती है।

सपने में चर्च देखना
यदि आप सपने में चर्च देखते हैं तो इस स्वप्न के अनुसार आपको जीवन में शांति प्राप्त होने वाली है। इस समय आपके जीवन की सभी परेशानियां समाप्त होने वाली है। जिससे आपके जीवन में सुख और शांति का आगमन होगा। सपने में चर्च देखने वाले व्यक्ति का मन और मस्तिष्क पूरी तरह से शांतिमय होगा। इस समय वह किसी भी बात की चिंता नहीं करेगा।

सपने में गुरुद्वारा देखना
यदि आप सपने में गुरुद्वारा देखते हैं तो इस स्वप्न के अनुसार आपके ज्ञान में वृद्धि होने वाली है। यह सपना इस बात का भी सूचक है कि आप इस समय आप किसी प्रतियोगी परिक्षा में भी सफल हो सकते हैं। अगर आपने यह सपना देखा है तो आपके ज्ञान में वृद्धि तो अवश्य होगी। चाहें वह किताबी ज्ञान हो या धार्मिक या किसी और प्रकार का इस सपने का आपको शुभ परिणाम ही मिलेगा।

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