जाने स्वास्तिक चिन्ह का महत्व

जाने स्वास्तिक चिन्ह का महत्व
जाने स्वास्तिक चिन्ह का महत्व

एक दूसरे को काटती हुई दो रेखाओं और आगे चल कर उनके चारों सिरों के दांई ओर मुड़ जाने वाले चिह्न को स्वस्तिवाचन का प्रतीक माना जाता है। स्वास्तिक अति प्राचीन पुण्यप्रतीक है, जिसमें गूढ़ अर्थ और गंभीर रहस्य छुपे हैं।

स्वस्तिक जिस मंत्र के प्रतीक रूप में चित्रित किया जाता है, वह यजुर्वेद से लिया गया है। स्वस्ति न इंद्रो वृद्धश्रवा… भाग से शुरु होने वाले मंत्र के प्रतीक स्वस्तिक की पूर्व दिशा में वृद्धश्रवा इंद्र, दक्षिण में बृहस्पति इंद्र, पश्चिम में पूषा-विश्ववेदा इंद्र तथा उत्तर दिशा में अरिष्टनेमि इंद्र स्थित हैं।

तंत्रालोक में आचार्य अभिनव गुप्त ने स्वस्तिक का अर्थ करते हुए लिखा है कि नादब्रह्म से अक्षर तथा वर्णमाला बनी, मातृका की उत्पत्ति हुई। नाद से ही वाणी के चारों रूप पश्यंती, मध्यमा तथा वैखरी उत्पन्न हुई। फिर उनके भी स्थूल तथा सूक्ष्म, दो भाग बने। इस प्रकार नाद सृष्टि से छह रूप हो गए। 

इन्हीं छह रूपों में, पंक्तियों में स्वस्तिक का रहस्य छिपा है। अतः स्वस्तिक को समूचे नादब्रह्म तथा सृष्टि का प्रतीक एवं पर्याय माना जा सकता है। स्वस्तिक की यह आकृति दो प्रकार की हो सकती है। प्रथम स्वस्तिक, जिसमें रेखाएं आगे की ओर इंगित करती हुई दांई ओर मुड़ती हैं।

इसे स्वस्तिक कहते हैं। यही शुभ चिह्व है, जो हमारी प्रगति की ओर संकेत करता है। दूसरी आकृति में रेखाएं पीछे की ओर संकेत करती हुई बाईं ओर मुड़ती हैं। इसे वामावर्त स्वस्तिक कहते हैं। भारतीय संस्कृति में इसे अशुभ माना जाता है। 

भारतीय दर्शन के अनुसार स्वस्तिक की चार रेखाओं को चार वेद, चार पुरूषार्थ, चार आश्रम, चार लोक तथा चार देवों अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा गणेश से तुलना की गई हैं। जैन धर्म में स्वस्तिक उनके सातवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ के प्रतीक चिन्ह के रूप में लोकप्रिय है। 

ऋग्वेद की ऋचा में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं की उपमा दी गई है। सिद्धान्तसार ग्रन्थ में उसे विश्व ब्रह्माण्ड का प्रतीक चित्र माना गया है। 

उसके मध्य भाग को विष्णु की कमल नाभि और रेखाओं को ब्रह्माजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरूपित किया गया है। अन्य ग्रन्थों में चार युग, चार वर्ण, चार आश्रम एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार प्रतिफल प्राप्त करने वाली सामाजिक व्यवस्था एवं वैयक्तिक आस्था को जीवन्त रखने वाले संकेतों को स्वस्तिक में ओत-प्रोत बताया गया है। 

इस चिह्न की मीमांसा करते हुए स्वस्तिक शब्द का अर्थ (सु-अच्छा, अस्ति-सत्ता, क-कर्ता) अच्छा या मंगल करने वाला भी किया गया है। स्वस्तिक अर्थात कुशल एवं कल्याण। कल्याण शब्द का उपयोग तमाम प्रश्नों के एक उत्तर में किया जाता है। 

शायद इसलिए भी यह चिह्न मानव जीवन में इतना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। संस्कृत में सु-अस धातु से स्वस्तिक शब्द बनता है। सु अर्थात् सुन्दर, श्रेयस्कर, अस् अर्थात् उपस्थिति, अस्तित्व। जिसमें सौन्दर्य एवं श्रेयस का समावेश हो, वह स्वस्तिक है।

मांगलिक कार्यों में इसका उपयोग किया जाता है। मांगलिक कार्यों में इसका निर्माण करने के लिए सिन्दूर, रोली या कुंकुम लाल रंग का ही प्रयोग होता है। लाल रंग प्रेम, रोमांच व साहस को दर्शाता है। 

यह रंग लोगों के शारीरिक व मानसिक स्तर को शीघ्र प्रभावित करता है। यह रंग शक्तिशाली व मौलिक है। यह रंग मंगल ग्रह का है जो स्वयं ही साहस, पराक्रम, बल व शक्ति का प्रतीक है।

यह सजीवता का प्रतीक है और हमारे शरीर में व्याप्त होकर प्राण शक्ति का पोषक है। मूलतः यह रंग ऊर्जा, शक्ति, स्फूर्ति एवं महत्त्वाकांक्षा का प्रतीक है। शरीर में लाल रंग की कमी से अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

लाल रंग से ही केसरिया, गुलाबी, मैहरुन और अन्य रंग बनाए जाते हैं। इन सब तथ्यों से प्रमाणित होता है कि स्वस्तिक लाल रंग से ही अंकित किया जाना चाहिए या बनाना चाहिए। 

पुराणों में स्वस्तिक को विष्णु का सुदर्शन चक्र माना गया है। उसमें शक्ति, प्रगति, प्रेरणा और शोभा का समन्वय है। इन्हीं के समन्वय से यह जीवन और संसार समृद्ध बनता है।

कोई समस्या  या सवाल है तो आप आचार्य जी से संपर्क कर सकते हैं  ।

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