Jul 17 2017

भगवान शिव को यह 11 वस्तुएं प्रिय हैं

 

भगवान शिव को यह 11 वस्तुएं प्रिय हैं

श्रावण माह 2017

 

 

भगवान शिव अपने भगतों की जल्दी सुनते हैं इस कारण उन्हे आशुतोष का नाम दिया गया है। ऐसी कौनसी वस्तुएं हैं जो भगवान शिव को प्रिय लगती हैं और जिन्हे अर्पित करने से आपकी मनोकामना पूरी होगी ।

 

वह 11 सामग्री है – जल, बिल्वपत्र, आंकड़ा, धतूरा, भांग, कर्पूर, दूध, चावल, चंदन, भस्म, रुद्राक्ष।

 

जल : शिव पुराण में लिखा गया है कि भगवान शिव ही स्वयं जल समान हैं क्योंकि समुद्र मंथन की कथा से जुड़ा है शिव पर जल चढ़ाने का महत्‍व शिव के अग्नि के तरह विष पीने क बाद उनका कंठ पूरी तरह नीला पड़ गया था।
समस्त देवी-देवताओं ने शिव को जल अर्पित किया ताकि विष की ऊष्मा को शांत किया जा सके और शिव को शीतलता प्रदान की जा सके इसलिए शिव पूजा में जल का विशेष महत्व माना गया है ।

 

बिल्वपत्र :  भगवान के तीन नेत्रों का प्रतीक माना जाता है बिल्वपत्र। शिव जी को अत्यंत प्रिय है तीन पत्तियों वाला बिल्वपत्र ।  प्रभु आशुतोष के पूजन में अभिषेक व बिल्वपत्र का प्रथम स्थान होता है।  संतो का कहना है कि बिल्वपत्र भोले-भंडारी को चढ़ाना तथा 1 करोड़ कन्याओं के कन्यादान का फल एक बराबर होता है।

 

आंकड़ा : शास्त्रों के मुताबिक शिव पूजा में एक आंकड़े का फूल चढ़ाना अच्छा माना गया हैं यह सोने के दान के बराबर फल देता है।

 

धतूरा : भगवान शिव को धतूरा भी अत्यंत पसंद है। इसके पीछे पुराणों मे धार्मिक कारण के साथ-साथ वैज्ञानिक आधार भी है। भगवान शिव कैलाश पर्वत पर रहते थे ।
यह अत्यंत ठंडा क्षेत्र है जहां ऐसे आहार और औषधि की जरुरत पड़ती है जो शरीर को उत्ताप प्रदान करे। वैज्ञानिक दृष्टि से धतूरा कम मात्रा में लिया जाए तो औषधि की तरह काम करता है और शरीर को अंदुरूनी गर्माहट देता है ।

जबकि इसका धार्मिक कारण देवी भागवत‍ पुराण में बताया गया है। इस पुराण के अनुसार शिव जी ने जब सागर मंथन से निकले हलाहल विष को पी लिया तब वह व्याकुल होने लगे।

तब अश्विनी कुमारों ने भांग, धतूरा बेल आदि औषधियों की मदद से शिव जी की व्याकुलता को दूर किया
उसी समय से ही शिव जी को भांग धतूरा प्रिय है। शिवलिंग पर मात्र धतूरा ही न चढ़ाएं बल्कि अपने मन और विचारों की कड़वाहट को भी अर्पित करें। 

 

भांग : शिव हमेशा ध्यान मे रहते हैं। भांग ध्यान को केंद्रित करने मे उपयोगी होती है इससे शिव हमेशा परमानंद में रहते हैं।
संसार की सुरक्षा के लिए समुद्र मंथन में निकले विष का सेवन महादेव ने अपने गले में उतार लिया।

भगवान को औषधि के रूप मे भांग दी गई परंतु प्रभु ने हर नकारात्मकता और कड़वाहट को परिपाक किया इसलिए भांग भी उन्हें प्रिय लगता है भगवान् शिव को इस बात के लिए भी प्रसिद्ध कि इस संसार में व्याप्त हर प्रकार की बुराईयों और नकारात्मक चीज़ को अपने भीतर बसा लेते हैं और विष से अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। 

 

कर्पूर : भगवान शिव का मंत्र है कर्पूरगौरं करूणावतारं…. अर्थात् जो कर्पूर के समान उज्जवल हैं। कर्पूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध और पवित्र बनाती है। भगवान भोलेनाथ को इस सुगन्ध से प्रेम है अत: कर्पूर शिव पूजन में अनिवार्य होता है ।  

 

भगवान शिव को यह 11 वस्तुएं प्रिय हैं

श्रावण माह 2017

दूध: श्रावण क महीने में दूध का सेवन निषेध होता है। सावन मास में दूध का सेवन नहीं करना चाहिए उसे शिव को अर्पित करने का विधान बनाया गया है ।

 

चावल :  चावल को अक्षत के नाम से भी जाना जाता है और अक्षत का अर्थ होता है जो टूटा हुआ न हो। इसका रंग सफेद होता है। पूजन में अक्षत का उपयोग अनिवार्य होता है। किसी भी पूजन के समय गुलाल, हल्दी, अबीर और कुंकुम अर्पित करने के बाद अक्षत चढ़ाए जाते हैं। अक्षत न हो तो शिव पूजन पूर्ण नहीं होता यहां तक कि पूजा में आवश्यक कोई सामग्री अनुप्लब्ध हो तो उसके जगह में भी चावल चढ़ाए जाते हैं। 

 

चंदन : चंदन का वर्णन शीतलता से किया गया है। भगवान शिव अपने मस्तक पर चंदन का त्रिपुंड लगाते हैं। चंदन का प्रयोग कई बार हवन में किया जाता है और इसकी खुशबू से वातावरण और खिल जाता है। यदि शिव जी को चंदन चढ़ाया जाए तो इससे समाज में मान सम्मान यश बढ़ता है।

 

भस्म : इसका अर्थ शुद्धता में छिपा है, वह पवित्रता जिसे भगवान शिव ने एक मृत व्यक्ति की जली हुई चिता में खोजा है। जिसे अपने तन पर लगाकर वे उस शुद्धता को सम्मान देते हैं। कहा जाता हैं शरीर पर भस्म लगाकर भगवान शिव खुद को मृत आत्मा से जोड़ते हैं। उनके अनुसार मरने के बाद मृत व्यक्ति को जलाने के बाद बची हुई राख में उसके जीवन का कोई कण बचता नहीं है ।

ना उसके दुख, सुख, ना कोई बुराई और ना ही उसकी कोई अच्छाई रह जाती है। इसलिए वह राख पवित्र है, उसमें किसी प्रकार का गुण-अवगुण नहीं है, इस राख को भगवान शिव अपने शरीर पर लगाकर उसे सम्मानित करते हैं। एक कथा यह भी कही गयी है कि सती ने जब अपने आप को अग्नि के हवाले कर दिया तो क्रोधित शिव ने उनकी भस्म को अपनी पत्नी की अंतिम निशानी मानकर उसे शरीर पर लगा लिया था ताकि सती भस्म के जरिए हमेशा उनके समीप रहे।

 

रुद्राक्ष : भगवान शिव ने रुद्राक्ष जन्म की कथा पार्वती जी से कही है। एक समय भगवान शिवजी ने एक हजार वर्ष तक समाधि लगाई। समाधि पूर्ण होने पर जब उनका मन बाहरी जगत में आया, तब जगत के कल्याण की कामना वाले महादेव ने अपनी आंख बंद कीं। तभी उनके नेत्र से जल के बिंदु पृथ्वी पर गिरे। उन्हीं से रुद्राक्ष के वृक्ष उत्पन्न हुए और वे शिव की इच्छा से भक्तों के हित के लिए समग्र देश में फैल गए। उन वृक्षों पर जो फल लगे वे ही रुद्राक्ष हैं।

Leave a Reply