वट सावित्री व्रत पूजा-विधि

वट सावित्री व्रत पूजा-विधि
वट सावित्री व्रत पूजा-विधि

वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को मनाया जाता है। इस बार वट सावित्री का व्रत 03 जून 2019 (सोमवार) को है। वट सावित्री व्रत की कथा सत्यवान-सावित्री की कथा जुड़ी हुई है। जिसमें सावित्री ने अपने संकल्प और श्रद्धा से, यमराज से, सत्यवान के प्राण वापस ले लिए थे। वट सावित्री व्रत पर महिलाएं भी संकल्प के साथ अपने पति की आयु और प्राण रक्षा के लिए इस दिन व्रत और संकल्प लेती हैं। इस व्रत के परिणामस्वरूप सुखद और संपन्न दाम्पत्य जीवन का वरदान प्राप्त होता है। वट सावित्री का व्रत समस्त परिवार को एक सूत्र में बांधे भी रखता है।

  • प्रातःकाल घर की सफाई कर नित्य कर्म से निवृत्त होकर स्नान करें।
  • तत्पश्चात पवित्र जल का पूरे घर में छिड़काव करें।
  • इसके बाद बांस की टोकरी में सप्त धान्य भरकर ब्रह्मा की मूर्ति की स्थापना करें।
  • ब्रह्मा के वाम पार्श्व में सावित्री की मूर्ति स्थापित करें।
  • इसी प्रकार दूसरी टोकरी में सत्यवान तथा सावित्री की मूर्तियों की स्थापना करें। इन टोकरियों को वट वृक्ष के नीचे ले जाकर रखें।
  • पूजा में जल, मौली, रोली, कच्चा सूत, भिगोया हुआ चना, फूल तथा धूप का प्रयोग करें।
  • जल से वटवृक्ष को सींचकर उसके तने के चारों ओर कच्चा धागा लपेटकर तीन बार परिक्रमा करें।
  • इसके बाद ब्रह्मा तथा सावित्री का पूजन करें।

अब निम्न श्लोक से सावित्री को अर्घ्य दें : –

अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते।
पुत्रान्‌ पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥

  • तत्पश्चात सावित्री तथा सत्यवान की पूजा करके बड़ की जड़ में पानी दें।

इसके बाद निम्न श्लोक से वटवृक्ष की प्रार्थना करें –

यथा शाखाप्रशाखाभिर्वृद्धोऽसि त्वं महीतले।
तथा पुत्रैश्च पौत्रैश्च सम्पन्नं कुरु मा सदा॥

  • बड़ के पत्तों के गहने पहनकर वट सावित्री की कथा सुनें।
  • भीगे हुए चनों का बायना निकालकर, नकद रुपए रखकर सासुजी के चरण-स्पर्श करें।
  • यदि सास वहां न हो तो बायना बनाकर उन तक पहुंचाएं।
  • वट तथा सावित्री की पूजा के पश्चात प्रतिदिन पान, सिन्दूर तथा कुंमकुंम से सौभाग्यवती स्त्री के पूजन का भी विधान है। यही सौभाग्य पिटारी के नाम से जानी जाती है। सौभाग्यवती स्त्रियों का भी पूजन होता है। कुछ महिलाएं केवल अमावस्या को एक दिन का ही व्रत रखती हैं।
  • इस व्रत में सावित्री-सत्यवान की पुण्य कथा का श्रवण करें अथवा औरों को सुनाएं।
  • पूजा समाप्ति पर ब्राह्मणों को वस्त्र तथा फल आदि वस्तुएं बांस के पात्र में रखकर दान करें।

कोई समस्या  या सवाल है तो आप आचार्य जी से संपर्क कर सकते हैं  ।

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