कछुए की अंगूठी धारण करने का क्या है महत्व

कछुए की अंगूठी धारण करने का क्या है महत्व
कछुए की अंगूठी धारण करने का क्या है महत्व

ज्योतिष शास्त्र में ऐसी कई उपाय है। जिन्हें अपना कर मनुष्य अपने जीवन की सभी परेशानियों को समाप्त कर सकता है। इन्हीं में से एक उपाय है कछुए की अंगूठी को लेकर । आजकल जिसके हाथ में देखो कछुए की अंगूठी अवश्य मिलेगी । कुछ लोग तो इसे शौकिया तौर पर पहनते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि एक छोटी सी कछुए की अंगूठी आपके जीवन की सभी परेशानियों को खत्म कर सकता है। ज्योतिष में भी कछुए को लेकर कई मान्यतांए हैं । दरअसल कछुए को भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी से जोड़कर देखा जाता है। अगर आप भी कछुए की अंगूठी धारण करना चाहते हैं और आपको इससे जुड़ी मान्यताओं के बारे में नहीं पता है तो आज हम आपको इन सब के बारे में बताएंगे ।

कछुए वाली अंगूठी से जुड़ी मान्यतांए :

1.कछुए को भगवान विष्णु का (कच्छप) अवतार माना जाता है। कछुए की अंगूठी पहनने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। इसी के साथ माना तो यह भी जाता है कि कछुए की अंगूठी पहनने से न केवल भगवान विष्णु की बल्कि माता लक्ष्मी की कृपा भी प्राप्त होती है।

2.कछुए वाली अंगूठी को वास्तुशास्त्र में भी काफी महत्त्व दिया गया है। वास्तुशास्त्र में कछुआ को सकारात्मक उर्जा का प्रतीक माना गया है। ऐसा माना जाता है कि कछुए वाली अंगूठी पहनने से शरीर में सकारात्मक उर्जा का संचार होता है।

3.विष्णु पुराण के अनुसार समुद्र मंथन के समय देवी लक्ष्मी के साथ कछुआ का भी प्रकट हुआ था, इसलिए कछुए को देवी लक्ष्मी का भी प्रिय माना जाता है।

4.ज्योतिष के अनुसार कछुए वाली अंगूठी को उन्नति का प्रतीक भी माना जाता है। इसलिए ऐसा माना जाता है कि इस अंगूठी को पहनने से उन्नति के सभी मार्ग खुल जाते हैं।

5.कछुए वाली अंगूठी पहनने से व्यक्ति में आत्मविश्वास और उर्जा का संचार अत्यधिक होता है। धन लाभ के लिए भी कछुए वाली अंगूठी पहनना अच्छा माना गया है। ऐसी मान्यता है कि कछुए वाली अंगूठी पहनने से माता लक्ष्मी प्रसन्न रहती हैं।

6.कछुए वाली अंगूठी पहनने से पहले इसे शुक्रवार को ही चांदी के धातु में बनवाना या खरीदना चाहिए। इस अंगूठी को पहनने के लिए शुभ दिन शुक्रवार माना गया है। शुक्रवार के दिन इस अंगूठी को गंगाजल से अभिषिक्त करना चाहिए।

7.इसके अलावे इस अंगूठी को पहनने से पूर्व लक्ष्मी के बीज मंत्र का 108 बार जाप करना चाहिए। यदि संभव हो धारण करने के क्रम में भी लक्ष्मी के मंत्र का जाप कर सकते हैं।

8.कछुए वाली अंगूठी को धारण करने के बाद इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि कछुए का सिर वाला हिस्सा पहनने वाले की ओर होना चाहिए।

9.माना जाता है कि कछुए वाली अंगूठी को धारण करने से व्यक्ति में कछुए की भांति हर काम के प्रति धैर्य और साहस का संचार होता है। जिससे उसके जीवन के सभी उन्नति के मार्ग खुलते हैं।

10.ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कछुए की अंगूठी को सीधे हाथ की मध्यमा या रिंग फिंगर में ही धारण करना शुभ होता है न हीं तो इसके शुभ परिणाम नहीं मिलते।

कोई समस्या  या सवाल है तो आप आचार्य जी से संपर्क कर सकते हैं  ।

वर-वधु का कुंडली मिलान ज़रूरी है या नहीं

वर-वधु का कुंडली मिलान ज़रूरी है या नहीं
वर-वधु का कुंडली मिलान ज़रूरी है या नहीं

सनातन संस्कृति की नींव षोडश संस्कारों में निहित है। इन षोडश संस्कारों में विवाह का महत्वपूर्ण स्थान है। बच्चों के युवा होते ही माता-पिता को उनके विवाह की चिंता सताने लगती है। विवाह का विचार मन में आते ही जो सबसे बड़ी चिंता माता-पिता के समक्ष होती है वह है अपने पुत्र या पुत्री के लिए योग्य जीवनसाथी की तलाश। इस तलाश के पूरी होते ही एक दूसरी चिंता सामने आ खड़ी होती है, वह है भावी दंपत्ति की कुंडलियों का मिलान जिसे ज्योतिष की भाषा में मेलापक कहा जाता है। प्राचीन समय में कुंडली-मिलान अत्यावश्यक माना जाता था।

वर्तमान सूचना और प्रौद्यागिकी के दौर में मेलापक केवल एक रस्म अदायगी बनकर रह गया है। ज्योतिष शास्त्र ने मेलापक में विलग-विलग आधार पर गुणों की कुल संख्या 36 निर्धारित की है जिसमें 18 या उससे अधिक गुणों का मिलान विवाह और दाम्पत्य सुख के लिए उत्तम माना जाता है।

हमारे अनुसार केवल गुणों की संख्या के आधार पर दाम्पत्य सुख निश्चय कर लेना उचित नहीं है। अधिकतर देखने में आया है कि 18 की अपेक्षा कहीं अधिक गुणों का मिलान होने पर भी दंपत्तियों के मध्य दाम्पत्य सुख का अभाव पाया गया है। इसका मुख्य कारण है मेलापाक को मात्र गुण आधारित प्रक्रिया समझना जैसे कोई परीक्षा हो। जिसमें न्यूनतम अंक पाने पर विद्यार्थी उत्तीर्ण अथवा 1-2 अंक कम आने से अनुत्तीर्ण घोषित कर दिया जाता है। ज्योतिष इतना सरल व संक्षिप्त नहीं है।

गुण आधारित मेलापक की यह विधि पूर्णतया कारगर नहीं है। हमारे अनुसार विवाह में कुंडलियों का मिलान करते समय गुणों के अतिरिक्त अन्य महत्वपूर्ण बातों का भी विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। भले ही गुण निर्धारित संख्या की अपेक्षा कम मिलें हो परन्तु दाम्पत्य सुख के अन्य कारकों से यदि दाम्पत्य सुख की सुनिश्चितता होती है तो विवाह करने में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए। आइए जानते हैं कि मेलापक करते या करवाते समय गुणों के अतिरिक्त किन विशेष बातों का ध्यान रखा जाना आवश्यक है।

मेलापक के समय ध्यान देने योग्य बातें
विवाह का उद्देश्य गृहस्थ आश्रम में पदार्पण के साथ ही वंश वृद्धि और उत्तम दाम्पत्य सुख प्राप्त करना होता है। प्रेम व सामंजस्य से परिपूर्ण परिवार ही इस संसार में स्वर्ग के समान होता है। इन उद्देश्यों की पूर्ति की संभावनाओं के ज्ञान के लिए मनुष्य के जन्मांग चक्र में कुछ महत्वपूर्ण कारक होते हैं। ये कारक हैं-सप्तम भाव एवं सप्तमेश, द्वादश भाव एवं द्वादशेश, द्वितीय भाव एवं द्वितीयेश, पंचम भाव एवं पंचमेश, अष्टम भाव एवं अष्टमेश के अतिरिक्त दाम्पत्य का नैसर्गिक कारक ग्रह शुक्र (पुरुषों के लिए) व गुरु (स्त्रियों के लिए)।

सप्तम भाव एवं सप्तमेश दाम्पत्य सुख प्राप्ति के लिए सप्तम भाव का विशेष महत्व होता है। सप्तम भाव ही साझेदारी का भी होता है। विवाह में साझेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। अतः सप्तम भाव पर कोई पाप ग्रह का प्रभाव नहीं होना चाहिए। सप्तम भाव के अधिपति का सप्तमेश कहा जाता है। सप्तम भाव की तरह ही सप्तमेश पर कोई पाप प्रभाव नहीं होना चाहिए और ना ही सप्तमेश किसी अशुभ भाव में स्थित होना चाहिए।

द्वादश भाव एवं द्वादशेश सप्तम भाव के ही सदृश द्वादश भाव भी दाम्पत्य सुख के लिए अहम माना गया है। द्वादश भाव को शैय्या सुख का अर्थात्‌ यौन सुख प्राप्ति का भाव माना गया है। अतः द्वादश भाव एवं इसके अधिपति द्वादशेश पर किसी भी प्रकार के पाप ग्रहों का प्रभाव दाम्पत्य सुख की हानि कर सकता है।


द्वितीय भाव एवं द्वितीयेश विवाह का अर्थ है एक नवीन परिवार की शुरूआत। द्वितीय भाव को धन एवं कुटुम्ब भाव कहते हैं। द्वितीय भाव से पारिवारिक सुख का पता चलता है। अतः द्वितीय भाव एवं द्वितीय भाव के स्वामी पर किसी पाप ग्रह का प्रभाव दंपत्ति को पारिवारिक सुख से वंचित करता है।

पंचम भाव एवं पंचमेशशास्त्रानुसार जब मनुष्य जन्म लेता है तब जन्म लेने के साथ ही वह ऋणी हो जाता है। इन्हीं जन्मजात ऋणों में से एक है पितृ ऋण। जिससे संतानोपत्ति के द्वारा मुक्त हुआ जाता है। पंचम भाव से संतान सुख का ज्ञान होता है। 
पंचम भाव एवं इसके अधिपति पंचमेश पर किसी पाप ग्रह का प्रभाव दंपत्ति को संतान सुख से वंचित करता है।

अष्टम भाव एवं अष्टमेश विवाहोपरान्त विधुर या वैधव्य भोग किसी आपदा के सदृश है। अतः भावी दम्पत्ति की आयु का भलीभांति परीक्षण आवश्यक है। अष्टम भाव एवं अष्टमेश से आयु का विचार किया जाता है। अष्टम भाव एवं अष्टमेश पर किसी पाप ग्रह का प्रभाव दंपत्ति की आयु क्षीण करता है।


नैसर्गिक कारक इन कारकों के अतिरिक्त दाम्पत्य सुख से नैसर्गिक कारकों जो वर की कुण्डली में शुक्र एवं कन्या की कुण्डली में गुरु होता है, पर पाप प्रभाव नहीं होना चाहिए। यदि वर अथवा कन्या की कुण्डली में दाम्पत्य सुख के नैसर्गिक कारक शुक्र व गुरु पाप प्रभाव से पीड़ित हैं या अशुभ भावों स्थित है तो दाम्पत्य सुख की हानि कर सकते हैं।


विंशोत्तरी दशा भी है महत्वपूर्ण उपरोक्त महत्वपूर्ण कारकों अतिरिक्त वर अथवा कन्या की महादशा एवं अंतर्दशाओं की भी कुण्डली मिलान में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है जिसकी अक्सर ज्योतिषी उपेक्षा कर देते हैं। हमारे अनुसार वर अथवा कन्या दोनों ही पर पाप व अनिष्ट ग्रहों की महादशा/अंतर्दशा का एक ही समय में आना भी दाम्पत्य सुख के लिए हानिकारक है। अतः उपरोक्त कारकों के मिलान एवं परीक्षण के उपरान्त महादशा व अंतर्दशाओं का परीक्षण परिणाम में सटीकता लाता है।

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एकाक्षी नारियल को क्यों साक्षात लक्ष्मी का रूप माना जाता है, क्या है इसकी विशेषता

एकाक्षी नारियल को क्यों साक्षात लक्ष्मी का रूप माना जाता है, क्या है इसकी विशेषता
एकाक्षी नारियल को क्यों साक्षात लक्ष्मी का रूप माना जाता है, क्या है इसकी विशेषता

-एकाक्षी नारियल : श्री और समृद्धि देता है यह श्रीफल

-धन को आकर्षित करता है एकाक्षी नारियल

हमारी सनातन eपद्धति में श्रीफल अर्थात् नारियल का विशेष महत्व है। हिन्दू धर्म की कोई भी पूजा बिना श्रीफल अर्पण के पूर्ण नहीं होती। चाहे वह प्रसाद रूप में हो या भेंट के रूप में, श्रीफल का हमारी पूजा पद्धति में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि सभी नारियल श्रीफल नहीं होते केवल एकाक्षी नारियल ही श्रीफल होता है।

‘श्री’ अर्थात् लक्ष्मी, ‘एकाक्षी नारियल’ को साक्षात् लक्ष्मी का रूप माना गया है। यह अत्यन्त दुर्लभ होता है। सैंकड़ों-हजारों नारियलों में कोई एक श्रीफल होता है। एकाक्षी नारियल अर्थात् श्रीफल जिसके भी पास होता है उस पर सदैव लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। उसे जीवन में कभी आर्थिक संकटों का सामना नहीं करना पड़ता। एकाक्षी नारियल को तोड़ना अशुभ होता है।

सामान्य नारियल की आकृति में तीन छिद्र दिखाई देते हैं जिन्हें प्रचलित भाषा में दो आंखें व एक मुख कहा जाता है। ध्यान से देखने पर आपको नारियल में तीन खड़ी रेखाएं भी दिखाई देती हैं किन्तु एकाक्षी नारियल अर्थात् श्रीफल में केवल दो छिद्र होते हैं। जिन्हें एक मुख व एक आँख कहा जाता है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है एकाक्षी अर्थात् एक आँख वाला।

एकाक्षी नारियल में तीन के स्थान पर केवल दो रेखाएं ही होती हैं। एकाक्षी नारियल प्राप्त होने पर विशेष मुहूर्तों जैसे दीपावली, होली, रवि-पुष्य, गुरु-पुष्य, ग्रहण काल आदि पर षोडषोपचार पूजा कर उसे लाल रेशमी वस्त्र में बांधकर अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान या तिजोरी में रखने या पूजा स्थान में रखने से सदैव लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। एकाक्षी नारियल में धन आकर्षण की अद्भुत क्षमता होती है।

कैसे करें एकाक्षी नारियल की पूजा

*एकाक्षी नारियल प्राप्त होने पर किसी शुभ मुहूर्त जैसे दीपावली, रवि-पुष्य, गुरु-पुष्य, होली इत्यादि में इसका विधिवत् पूजन करें।

*पूजाघर में एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं
उस पर एकाक्षी नारियल स्थापित करें।

*घी व सिन्दूर का लेप तैयार करें।


*उस लेप को एकाक्षी नारियल पर अच्छे से लगाएं ध्यान रहे कि केवल आंख को छोड़कर शेष पूरे नारियल को घी मिश्रित सिन्दूर के लेप से आवेष्टित करना है।

*तत्पश्चात एकाक्षी नारियल को कलावा या मौली से लपेटकर अच्छी तरह से पूरा ढंककर लाल रेशमी वस्त्र में बांधकर उसकी षोडषोपचार पूजा करें। पूजा के उपरान्त निम्न मंत्र की कम से कम 11 माला कर एकाक्षी नारियल को सिद्ध करें।

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं महालक्ष्मी स्वरूपाय एकाक्षी नारिकेलाय नम:

जप के उपरान्त निम्न मंत्र की 1 माला से हवन करें।

“ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं महालक्ष्मी स्वरूपाय एकाक्षि नारिकेलाय सर्वसिद्धिं कुरू कुरू स्वाहा॥”

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पूजा करते समय कुछ खास बातों का अवश्य रखें ध्यान

पूजा करते समय कुछ खास बातों का अवश्य रखें ध्यान
पूजा करते समय कुछ खास बातों का अवश्य रखें ध्यान

धार्मिक शास्त्रों एवं ज्योतिष के अनुसार पूजा का एक निश्चित समय होना चाहिए। हमें जीवन को सुखी और समृद्धिशाली बनाने के लिए देवी-देवताओं की पूजा करते समय कुछ खास बातें अवश्य ध्यान में रखनी चाहिए। तभी हमारी सारी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी। 


* ईशान कोण में मंदिर सर्वश्रेष्ठ होता है। 

* कम से कम देवी-देवता पूजा स्थान में स्थापित करें। एकल रूप में स्थापित करें। 

* पूजन के कार्य के लिए- ब्रह्म मुहूर्त सवेरे 3 बजे से, दोपहर 12 बजे तक के पूर्व का समय निश्चित करें।

* पूजा के समय हमारा मुंह ईशान, पूर्व या उत्तर में होना चाहिए, जिससे हमें सूर्य की ऊर्जा एवं चुंबकीय ऊर्जा मिल सके। इससे हमारा दिनभर शुभ रहे।

*अपने मन को हमेशा पवित्र रखें। दूसरों के प्रति सद्भावना रखें, तभी आपकी पूजा सात्विक होगी एवं ईश्वर आपको हजार गुना देगा।

*मंदिर और देवी-देवताओं की मूर्ति के सामने कभी भी पीठ दिखाकर नहीं बैठना चाहिए।

*इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि कभी भी दीपक से दीपक नहीं जलाएं। शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति दीपक से दीपक जलते हैं, वे रोगग्रस्त होते हैं।

*कभी भी सूर्यदेव को शंख के जल से अर्घ्य अर्पित करना चाहिए।

इस तरह प्रतिदिन भगवान की पूजन-अर्चन करने से आपके समस्त दुख दूर होंगे। ईश्वर पर पूर्ण भरोसा रखने से ही आपके समस्त कार्य निर्विघ्न पूर्ण होंगे।

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भूमि का चयन करने से पहले ज़रूर जान लें ये खास बातें

भूमि का चयन करने से पहले ज़रूर जान लें ये खास  बातें
भूमि का चयन करने से पहले ज़रूर जान लें ये खास बातें

मकान, दुकान या प्लॉट खरीदने से पहले उसके चारों ओर की बनावट, वातावरण और मूलभूत ढांचे की समीक्षा कर लेनी चाहिए। 

भूमि का चयन करना इतना आसान नहीं है जितना कि लोग समझते हैं। जिस जगह वास्तु कार्य होना है, उस जगह के वातावरण के साथ पानी की व्यवस्था का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए।

जान लें ये 12 खास बातें:-

1 वास्तु के स्थान पर गंदा नाला व वर्कशॉप आदि नहीं होना चाहिए।
2 किसी भी गली या आवास स्थल की कतार में अंतिम मकान कभी नहीं खरीदना चाहिए। सड़क के किनारे बना हुआ मकान भी शुभ नहीं होता है।
3 तीन कोणों से युक्त तिकोनी भूमि कभी नहीं खरीदना चाहिए। एक तरफ अधिक चौड़ा एवं एक तरफ कम चौड़ा भी अशुभ होता है।
4 हवा, पानी, प्रकाश, चौड़ी गली तथा अपने नाम राशि के अनुकूल नगर एवं कॉलोनी में ही बसना चाहिए।
5 ढलान व डूब वाले स्थान में मकान नहीं बनाना चाहिए।
6 किचन, गार्डन, फव्वारा आदि मुख्य द्वार के सामने नहीं बनाना चाहिए।
7 मुख्य द्वार के सामने बाउंड्री वॉल नहीं होना चाहिए।
8 सार्वजनिक टंकी की छाया घर पर पड़े, तो वह मकान निवास करने योग्य नहीं होता।
9 दो बड़े मकानों के बीच में एक छोटा मकान हो, तो छोटा मकान रहने वालों के लिए हानिकारक होता है।
10 मकान के आसपास मंदिर, मस्जिद, मीनार या नाला शुभ नहीं है।
11 मकान से 1,800 फीट के अंदर मंदिर, मस्जिद, धर्मशाला, स्कूल व कॉलेज नहीं होना चाहिए। मकान के मुख्य द्वार के सामने शिव, विष्णु व दुर्गा का मंदिर भी नहीं होना चाहिए।
12 भवन निर्माण के सभी कार्य एवं लेन-देन जहां तक हो सके, शुभ महीने, शुभ वार, शुभ तिथि को ही करना चाहिए एवं योग्य ज्योतिषी की सलाह से ही कार्य करें।

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चार धामों में से एक है बद्रीनाथ धाम

चार धामों में से एक है बद्रीनाथ धाम
चार धामों में से एक है बद्रीनाथ धाम

हिन्दुओं के चार धामों में से एक बद्रीनाथ धाम भगवान विष्णु का निवास स्थल है। यह भारत के उत्तरांचल राज्य में अलकनंदा नदी के बाएं तट पर नर और नारायण नामक दो पर्वत श्रेणियों के बीच स्थित है। गंगा नदी की मुख्य धारा के किनारे बसा यह तीर्थस्थल हिमालय में समुद्र तल से 3,050 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यहां प्रचुर मात्रा में पाई जाने वाली जंगली बेरी बद्री के कार इस धाम का नाम बद्री पड़ा।


यहां भगवान विष्णु का विशाल मंदिर है और यह संपूर्ण क्षेत्र प्राकृति की गोद में स्थित है। यहां बदरीनाथ की मूर्ति शालग्रामशिला से बनी हुई, चतुर्भुज ध्यानमुद्रा में है। यहां नर-नारायण विग्रह की पूजा होती है और अखण्ड दीप जलता है, जो कि अचल ज्ञानज्योति का प्रतीक है। 

मंदिर में बदरीनाथ की दाहिनी ओर कुबेर की मूर्ति भी है। उनके सामने उद्धवजी हैं तथा उत्सवमूर्ति है। उत्सवमूर्ति शीतकाल में बरफ जमने पर जोशीमठ में ले जाई जाती है। उद्धवजी के पास ही चरणपादुका है। बायीं ओर नर-नारायण की मूर्ति है। इनके समीप ही श्रीदेवी और भूदेवी है। 

भगवान विष्णु की प्रतिमा वाला वर्तमान मंदिर 3,133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और माना जाता है कि आदि शंकराचार्य, आठवीं शताब्दी के दार्शनिक संत ने इसका निर्माण कराया था। इसके पश्चिम में 27 किमी की दूरी पर स्थित बद्रीनाथ शिखर कि ऊंचाई 7,138 मीटर है। बद्रीनाथ में एक मंदिर है, जिसमें बद्रीनाथ या विष्णु की वेदी है। यह 2,000 वर्ष से भी अधिक समय से एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान रहा है।

बद्रीनाथ के अन्य धार्मिक स्थल-
1.अलकनंदा के तट पर स्थित अद्भुत गर्म झरना जिसे ‘तप्त कुंड’ कहा जाता है।
2.एक समतल चबूतरा जिसे ‘ब्रह्म कपाल’ कहा जाता है।
3.पौराणिक कथाओं में उल्लेखित एक ‘सांप’ शिल्ला है।
4.शेषनाग की कथित छाप वाला एक शिलाखंड ‘शेषनेत्र’ है।
5. भगवान विष्णु के पैरों के निशान हैं- ‘चरणपादुका’
6.बद्रीनाथ से नजर आने वाला बर्फ़ से ढंका ऊंचा शिखर नीलकंठ, जो ‘गढ़वाल क्वीन’ के नाम से जाना जाता है।

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महिलाओं के पैरों के आकर से जानिए उनका भाग्य, स्वाभाव और भविष्य

महिलाओं के पैरों के आकर से जानिए उनका भाग्य, स्वाभाव और भविष्य
महिलाओं के पैरों के आकर से जानिए उनका भाग्य, स्वाभाव और भविष्य

समुद्रशास्त्र किसी भी व्यक्ति के अंग से उसकी पूरे की जानकारी दे सकता है। व्यक्ति का स्वाभाव कैसा, उसके क्या सकारात्मक पक्ष है और क्या नकारात्मक पक्ष है। आप इस शास्त्र से आसानी से जान सकते है। किसी भी व्यक्ति के पैर उसके पूरे चरित्र को बयान कर देते हैं। पैरों की उंगली,अंगूठे , घुटने , उनकी त्वचा ये सभी महत्वपूर्ण है। पूराने जमाने में जब भी किसी लड़की को शादी के लिए देखा जाता था तो उसके पैरों को अधिक महत्व दिया जाता था । कई जगह यह परंपरा आज भी है । अगर आप इसके बारे में नहीं जानते तो आज हम आपको इसके बारें में बतायेंगे। तो आइए जानते हैं महिलाओं के पैरों के बारें में:

महिलाओं के पैरों की त्वचा

जिस महिला के पैरों की त्वचा कोमल,मुलायम और लाल रंग लिए होती है । वह महिला मिलनसार,हंसमुख और जीवन के प्रत्येक कार्यों का आनंद उठाती है । जीवन के किसी भी श्रेत्र में परिस्थिति के अनुसार अपने आप को आसानी से ढाल लेती हैं। यही इनकी सबसे बड़ी खासियत है। शादी के बाद इन्हें पति का भरपूर प्यार और साथ मिलता है। ऐसी स्त्रियां ससुरालवालों की सेवा करती है। इनके सास -ससुर भी इन्हें पसंद करते हैं । इतना ही नहीं यह बच्चों के साथ भी आसानी से घुल मिल जाती हैं। ऐसी स्त्रियां आर्थिक रुप से भी सम्पन्न होती है। जॉब हो या बिजनेस ये महिलांए हर जगह अपनी छाप छोड़ती है।

पैर के अंगूठे का आकार

जिस महिला के पैर का अंगूठा बड़ा होता है।ऐसी स्त्रियां हमेशा खुश रहेने वाली होती है। इन्हें गुस्सा भी बहुत कम आता है। लेकिन जब इन्हें गुस्सा आता है तब यह काफी हिसंक हो जाती है। उस समय यह किसी की भी बात नहीं सुनती । इनके पति और प्रेमी इन पर अधिक विश्वास करती हैं। धन की बात करें तो ऐसी स्त्रियां धन से परिपूर्ण होती हैं ।यह दूसरों के पैसों को खर्च करने से ज्यादा अपना पैसा खर्च करना ज्यादा पसंद करती है। स्वाभाव से यह साफ दिल की होती है । ऐसी स्त्रियां अपनी बात को भी छुपाने में माहिर होती है।

महिलाओं के घुटने

जिस महिला के घुटने गोल,मुलायम और सुंदर होते हैं।वह स्त्री लक्ष्मी स्वरुप मानी जाती हैं। ऐसी महिला भाग्यशाली होती हैं । इनकी शादी जिस किसी भी घर में होती हैं। वहां कभी भी पैसों की कमी नहीं होती। जिन महिलाओं के घुटने ढीले ,हड्डीदार होते है। ऐसी महिलांए अपने पति या प्रेमी को धोखा देने में माहिर होती है। यह हमेशा झूठ बोलती हैं। धन की बात करें तो इनकी जिंदगी गरीबी में ही गुजरती है। इनकों धन की कमी हमेशा ही रहती है। इनकी फिजूलखर्ची भी इनकी एक बूरी आदत है।

महिलाओं के पैरों की उंगलियां

जिन महिलाओं की उंगलियां छोटे और असामान्‍य आकार की होती है। वह जीवन में काफी कष्ट उठाती हैं।इन्हें जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में असफलातओं का ही मुहं देखना पड़ता है। जिन महिलाओं के पैरों की अंगुलियां मुलायम , चमकती , नाखून गोल होते हैं तो ऐसी स्त्रियां हमेशा प्रसन्‍न रहती और उनका स्‍वास्‍थ्‍य भी उत्तम रहता है। वहीं दूसरी ओर काले और टूटे हुए नाखून चरित्र में कमजोरी की तरफ इशारा करते हैं।

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