अक्षय तृतीया में दान का है विशेष महत्व, पूजा विधि व खरीदारी का शुभ मुहूर्त

अक्षय तृतीया में दान का है विशेष महत्व, पूजा विधि व खरीदारी का शुभ मुहूर्त
अक्षय तृतीया में दान का है विशेष महत्व, पूजा विधि व खरीदारी का शुभ मुहूर्त

हिंदू धर्म और रीति-रिवाजों में अक्षय तृतीया का काफी महत्वपूर्ण स्थान है। बैसाख की तृतीया का यह दिन हिंदू पंचांग में सबसे शुभ तिथि मानी जाती है । बैसाख महीने की शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया कहा जाता है। अक्षय तृतीया का अर्थ है जिसका कभी क्षय न हो, जो कभी नष्ट न हो सके या जिसे नष्ट न किया जा सके. इसलिए इस दिन लोग सोने की खरीदारी करते हैं क्योंकि लोगों को सोने से काफी लगाव है। 

इस साल बैसाख महीने में अक्षय तृतीया 7 मई 2019 को मनाई जाएगी। 

इस दिन दिए गए दान से अक्षय फल की प्राप्ति होती है। सुख समृद्धि और सौभाग्य की कामना से इस दिन शिव-पार्वती और नर नारायण की पूजा का विधान है। चूंकि तृतीया मां गौरी की तिथि है कि इस दिन गृहस्थ जीवन में सुख-शांति की कामना से की गई प्रार्थना तुरंत स्वीकार होती है। गृहस्थ जीवन को निष्कंटक रखने के लिए इस दिन उनकी पूजा की जाना चाहिए। 

अक्षय तृतीया के दिन यह 14 दान है महत्वपूर्ण :

1. गौ, 2. भूमि, 3. तिल, 4. स्वर्ण, 5. घी, 6. वस्त्र, 7. धान्य, 8. गुड़, 9. चांदी, 10. नमक, 11. शहद, 12. मटकी, 13 खरबूजा 14. कन्या।  

इस दिन इन 14 तरह के दान का विशेष महत्व माना गया है। सुख, प्रसन्नता, वैभव, शांति, स्नेह, पराक्रम, यश, सौभाग्य में आश्चर्यजनक श्रीवृद्धि होगी। अगली तृतीया तक इस दान के चमत्कार को आप स्वयं महसूस कर सकते हैं।  

सोना खरीदने का शुभ मुहूर्त-
7 मई 2019, मंगलवार = प्रातः 03:17 बजे से 05:40 बजे तक।

ऐसे करें पूजा

अक्षय तृतीया पूजा मुहूर्त : सुबह 05:40 से दोपहर 12:17 बजे तक।

अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए। इस शुभ तिथि पर श्री विष्णुसहस्त्रनाम और श्री सूक्त पाठ का काफी महात्म्य है. यह पाठ कर आप जीवन में धन, यश, पद और प्रतिष्ठा कमा सकते हैं। पूजन के दौरान भगवान विष्णु को पीला पुष्प अर्पित करें और पीला वस्त्र धारण कराएं।   घी के 9 दीपक जलाकर पूजा शुरू करें. बीमारी से छुटकारा पाने के लिए राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करें, अवश्य लाभ होग।  

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क्या होता है पंचक, इसे क्यों माना जाता है अशुभ

क्या होता है पंचक, इसे क्यों माना जाता है अशुभ
क्या होता है पंचक, इसे क्यों माना जाता है अशुभ

ज्योतिष में पंचक को शुभ नक्षत्र नहीं माना जाता है। इसे अशुभ और हानिकारक नक्षत्रों का योग माना जाता है। नक्षत्रों के मेल से बनने वाले विशेष योग को पंचक कहा जाता है। जब चन्द्रमा, कुंभ और मीन राशि पर रहता है, तब उस समय को पंचक कहते हैं। 

इसी तरह घनिष्ठा से रेवती तक जो पांच नक्षत्र (घनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद एवं रेवती) होते हैं, उन्हे पंचक कहा जाता है। प्राचीन ज्योतिष में आमतौर पर माना जाता है कि पंचक में कुछ कार्य विशेष नहीं किए जाते हैं।

* पंचक के दौरान जिस समय घनिष्ठा नक्षत्र हो उस समय घास, लकड़ी आदि ईंधन एकत्रित नहीं करना चाहिए, इससे अग्नि का भय रहता है।

*पंचक में किसी की मृत्यु होने से और पंचक में शव का अंतिम संस्कार करने से उस कुटुंब या निकटजनों में पांच मृत्यु और हो जाती है।

* पंचक के दौरान दक्षिण दिशा में यात्रा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि दक्षिण दिशा, यम की दिशा मानी गई है। इन नक्षत्रों में दक्षिण दिशा की यात्रा करना हानिकारक माना गया है।

* पंचक के दौरान जब रेवती नक्षत्र चल रहा हो, उस समय घर की छत नहीं बनाना चाहिए, ऐसा विद्वानों का मत है। इससे धन हानि और घर में क्लेश होता है। 

* मान्यता है कि पंचक में पलंग बनवाना भी बड़े संकट को न्यौता देना है।

*पंचक के प्रभाव से घनिष्ठा नक्षत्र में अग्नि का भय रहता है। शतभिषा नक्षत्र में कलह होने के योग बनते हैं। पूर्वाभाद्रपद रोग कारक नक्षत्र होता है। उत्तराभाद्रपद में धन के रूप में दंड होता है। रेवती नक्षत्र में धन हानि की संभावना होती है।

पंचक का प्रभाव :
*पंचक के प्रभाव से घनिष्ठा नक्षत्र में अग्नि का भय रहता है। शतभिषा नक्षत्र में कलह होने के योग बनते हैं। पूर्वाभाद्रपद रोग कारक नक्षत्र होता है। उत्तराभाद्रपद में धन के रूप में दंड होता है। रेवती नक्षत्र में धन हानि की संभावना होती है।

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कालाष्टमी कालभैरव जयंती में किस देवता की पूजा की जाती है

कालाष्टमी कालभैरव जयंती में किस देवता की पूजा की जाती है
कालाष्टमी कालभैरव जयंती में किस देवता की पूजा की जाती है

भारतीय धर्म ग्रंथों के अनुसार हर हिंदू माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कालाष्टमी मनाई जाती है। इसे ‘भैरवाष्टमी’ भी कहते हैं। इस महीने कालाष्टमी 26 अप्रैल 2019 (शुक्रवार) को है. हिंदू धर्म में यह माना जाता है कि कालाष्टमी के दिन ही भगवान शिव ने भैरव का रूप धारण किया था। इस दिन मां दुर्गा की पूजा और व्रत का भी विधान माना गया है।

क्यों रखा जाता है कालाष्टमी का व्रत

पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार एक बार भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा के बीच विवाद छिड़ गया कि उनमे से श्रेष्ठ कौन है? यह विवाद इतना अधिक बढ़ गया कि सभी देवता घबरा गए। उन्हें डर था कि दोनों देवताओं के बीच युद्ध ना छिड़ जाए और प्रलय ना आ जाए।

सभी देवता घबराकर भगवन शिव के पास चल गए और उनसे समाधान ढूंढ़ने का निवेदन किया। जिसके बाद भगवान शंकर ने एक सभा का आयोजन किया जिसमें भगवान शिव ने सभी ज्ञानी, ऋषि-मुनि, सिद्ध संत आदि और साथ में विष्णु और ब्रह्मा जी को भी आमंत्रित किया।

इस सभा में निर्णय लिया गया कि सभी देवताओं में भगवान शिव श्रेष्ठ है। इस निर्णय को सभी देवताओं समेत भगवान विष्णु ने भी स्वीकार कर लिया। ब्रह्मा ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया। वे भरी सभा में भगवान शिव का अपमान करने लगे। भगवान शंकर इस तरह से अपना अपमान सह ना सके और उन्होंने रौद्र रूप धारण कर लिया।

भगवान शंकर प्रलय के रूप में नजर आने लगे और उनका रौद्र रूप देखकर तीनों लोक भयभीत हो गए। भगवान शिव के इसी रूद्र रूप से भगवान भैरव प्रकट हुए. वह श्वान (कुत्ते) पर सवार थे, उनके हाथ में एक दंड था और इसी कारण से भगवान शंकर को ‘दंडाधिपति’ भी कहा गया है। पुराणों के अनुसार भैरव जी का रूप अत्यंत भयंकर था। उन्होंने ब्रह्म देव के पांचवें सिर को काट दिया तब ब्रह्म देव को अपनी गलती का एहसास हुआ।

कालाष्टमी की पूजा विधि 

भगवान शिव द्वारा प्रकट भगवान भैरव का जन्म मार्गशीर्ष कृष्णाष्टमी के दिन हुआ इसलिये हर माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी के मध्यरात्रि में भैरव की पूजा की जाती है और कुछ जगह रात्रि जागरण भी किया जाता है। दिन में कुछ भैरव उपासक व्रत भी रखते हैं।

माना जाता है कि भगवान शिव के भैरव रूप की उपासना करने वाले भक्तों को भैरवनाथ की षोड्षोपचार सहित पूजा करनी चाहिए। माना जाता है कि भैरव की आराधना करने से हर तरह की पीड़ा से मुक्ति मिलती है। और विशेषकर जातक की जन्मकुंडली में बैठे अशुभ व क्रूर ग्रह तथा शनि, राहू, केतु व मंगल जैसे मारकेश ग्रहों का प्रभाव कम होता है और व्यक्ति धीरे- धीरे एक सदमार्ग की ओर आगे चलता है। भगवान काल भैरव के जप-तप व पूजा-पाठ और हवन से मृत्यु तुल्य कष्ट भी समाप्त हो जाते हैं।

इस मंत्र का करें जाप-

शिव पुराण में कहा है कि भैरव परमात्मा शंकर के ही रूप हैं इसलिए आज के दिन इस मंत्र का जाप करना फलदायी होता है।

अतिक्रूर महाकाय कल्पान्त दहनोपम्, भैरव नमस्तुभ्यं अनुज्ञा दातुमर्हसि !!

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वैशाख मास में मात्र जल दान से मिलेगी पुण्य की प्राप्ति

वैशाख मास में मात्र जल दान से मिलेगी पुण्य की प्राप्ति
वैशाख मास में मात्र जल दान से मिलेगी पुण्य की प्राप्ति

न माधवसमो मासो न कृतेन युगं समम्।

न च वेदसमं शास्त्रं न तीर्थं गंगया समम्।।

अर्थात् वैशाख के समान कोई मास नहीं है, सत्ययुग के समान कोई युग नहीं है, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है और गंगा जी के समान कोई तीर्थ नहीं है। वैशाख मास अपने कतिपय वैशिष्ट्य के कारण उत्तम मास है, जो इस वर्ष शनिवार 20 अप्रैल से प्रारम्भ होकर शनिवार 18 मई तक रहेगा। वैशाख मास को ब्रह्मा जी ने सब मासों में उत्तम सिद्ध किया है। वह माता की भाँति सब जीवों को सदा अभीष्ट वस्तु प्रदान करने वाला है। धर्म, यज्ञ, क्रिया, तपस्या का सार है। सम्पूर्ण देवताओं द्वारा पूजित है। जैसे विद्याओं में वेद-विद्या, मन्त्रों में प्रणव, वृक्षों में कल्पवृक्ष, धेनुओं में कामधेनु, देवताओं में विष्णु, प्रिय वस्तुओं में प्राण, नदियों में गंगा जी, तेजों में सूर्य उत्तम है, उसी प्रकार धर्म के साधनभूत महीनों में वैशाख मास सबसे उत्तम है।

वैशाख में स्नान मात्र से प्रसन्न होते हैं भगवान विष्णु

भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला उसके समान दूसरा कोई मास नहीं है। जो वैशाख में सूर्योदय से पहले स्नान करता है, उससे भगवान विष्णु निरन्तर प्रीति करते हैं। पाप तभी तक गर्जते हैं, जब तक जीव वैशाख में प्रात:काल जल में स्नान नहीं करता। वैशाख महीने मे सब तीर्थ, देवता आदि बाहर के जल में भी सदैव स्थित रहते हैं।

जल दान से मिता है सभी तीर्थों का फल

वैशाख सर्वश्रेष्ठ मास है और शेषशायी भगवान विष्णु को सदा प्रिय है। सब दानों से जो पुण्य होता है और सब तीर्थों में जो फल होता है, उसी को मनुष्य वैशाख मास में केवल जल दान करके प्राप्त कर लेता है। दो जल दान में असमर्थ है, ऐसे ऐश्वर्य की अभिलाषा रखने वाले पुरुष को उचित है कि वह दूसरे को प्रबोध करे, दूसरे को जल दान का महत्व समझाए। यह सब दानों से बढ़कर हितकारी है। जो मनुष्य वैशाख मास में मार्ग पर यात्रियों के लिए प्याऊ लगाता है, वह विष्णु लोक में प्रतिष्ठित होता है।

प्याऊ लगवाने से मिलता है ये लाभ

प्याऊ देवताओं, पितरों तथा ऋषियों को अत्यन्त प्रीति देने वाला है। जिसने प्याऊ लगाकर रास्ते के थके—हारे मनुष्यों को संतुष्ट किया है, उसने ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवताओं को संतुष्ट कर लिया है। वैशाख मास में प्याऊ की स्थापना, भगवान शिव के ऊपर जलधारा की स्थापना, जूता-चप्पल-छाता दान, चिकना वस्त्र दान, चन्दन दान, शीतल जल का पूर्ण पात्र दान करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्ति होती है।

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वास्तु के अनुसार कौनसा रंग लगाने से आपके घर में सुख-समृद्धि आएगी

वास्तु के अनुसार कौनसा रंग लगाने से आपके घर में सुख-समृद्धि आएगी
वास्तु के अनुसार कौनसा रंग लगाने से आपके घर में सुख-समृद्धि आएगी

वास्तु के अनुसार घर का रंग होने से सुख समृद्धि आती है। घर का रंग हमारे अंतर्मन और विचारों को निश्चित रूप से प्रभावित करता है। जिस प्रकार घर बनाने में पांच तत्वों पृथ्वी, जल, अग्नि,वायु और आकाश का समावेश होता है उसी प्रकार जिस शरीर को हम सब धारण किये हुए है वह भी पंचतत्त्व से निर्मित है यही कारण है की यदि घर में वास्तु दोष होता है तब उस घर में रहने वाले घर के स्वामी और सदस्यों के ऊपर विपरीत प्रभाव होता है और अनेक प्रकार के कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

वास्तु शास्त्र के अनुसार हमारे घर की प्रत्येक वस्तु हमें प्रभावित करती है उसी प्रकार घर की दीवारों का रंग भी हमारे अन्तःचेतना, स्वभाव तथा कार्यप्रणाली को पूर्णरूपेण प्रभावित करता है। सामान्यतः रंग को देखते ही हमारे अंदर रंग के अनुरूप कुछ कुछ होने लगता है

जैसे – सफेद रंग को देखते ही मन को शान्ति मिलती है वही लाल रंग को देखकर मन में उतावलापन बढ़ जाता है और यदि लाल रंग का प्रयोग आपने अपने शयन कक्ष किया है तो आपको अपने बीवी से अकारण क्लेश होना स्वाभाविक है।घर या अपार्टमेंट के इंटीरियर ( आंतरिक सज्जा ) में रंग का सही इस्तेमाल करके अपने व्यक्तिगत तथा पारिवारिक जीवन में आने वाली समस्याओं से शीघ्र ही मुक्ति मिल सकती है। वास्तु शास्त्र के अनुसार घर की हर वस्तु हमें पूरी तरह प्रभावित करती है। घर की दीवारों का रंग भी हमारे विचारों और कार्यप्रणाली को प्रभावित करता है। हमारे घर का जैसा रंग होता है, उसी रंग के स्वभाव जैसा हमारा स्वभाव भी हो जाता है। इसी वजह से घर की दीवारों पर वास्तु के अनुसार बताए गए रंग ही रखना चाहिए।

-भवन में उत्तर का भाग जल तत्व का माना जाता है। इसे धन यानी लक्ष्मी का स्थान भी कहा जाता है। अत: इस स्थान को अत्यंत पवित्र व स्वच्छ रखना चाहिए और इसकी साज-सजा में हरे रंग का प्रयोग किया जाना चाहिए।

-उत्तर-पूर्वी कक्ष, जिसे घर का सबसे पवित्र कक्ष माना जाता है, में सफेद या बैंगनी रंग का प्रयोग करना चाहिए। इसमें अन्य गाढ़े रंगों का प्रयोग कतई न करें।

-उत्तर-पश्चिम कक्ष के लिए सफेद रंग को छोड़कर कोई भी रंग चुन सकते हैं।

-दक्षिण-पूर्वी कक्ष में पीले या नारंगी रंग का प्रयोग करना चाहिए जबकि दक्षिण-पश्चिम कक्ष में भूरे, ऑफ व्हाइट या भूरा या पीला मिश्रित रंग प्रयोग करना चाहिए।

-यदि बेड दक्षिण-पूर्वी दिशा में हो, तो कमरे में हरे रंग का प्रयोग करें।

-अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार लाने के लिए आपको अपने कमरे की उत्तरी दीवार पर हरा रंग करवाना चाहिए।  आसमानी रंग जल तत्व को इंगित करता है। घर की उत्तरी दीवार को इस रंग से रंगवाना चाहिए।

-घर की खिड़कियां और दरवाजे हमेशा गहरे रंगों से रंगवाएं। बेहतर होगा कि आप इन्हें डार्क ब्राउन रंग से पेंट करवाएं। रंगों का भी रिश्तों पर खासा असर होता है, जहां तक संभव हो घर के अंदर की दीवारों पर हल्के रंगों जैसे हल्का गुलाबी, हल्का नीला, ब्राउनिश ग्रे या ग्रेइश येलो रंग का ही प्रयोग करें। ये रंग शांत, स्थिर और प्यार को बढ़ाने वाले हैं। इनसे व्यवहार में उग्रता नहीं आती।

-जिन लोगों के एक ही घर में दो गृहस्वामी होते हैं, उन्हें अपने घर की भीतरी दीवारों को दो रंगों से पुतवाना चाहिए।

-घर के ड्राइंग रूम, ऑफिस आदि की दीवारों पर यदि आप पीला रंग करवाते हैं तो वास्तु के अनुसार, यह शुभ होता है।

-घर के बाहर की दीवारों को वेदरप्रूफ यानी मौसम से बेअसर रहने वाले रंग से पुतवा सकते हैं। घर के अंदर प्लास्टिक पेंट लगवा सकते हैं।अतः यदि आप अपने घर में वास्तु शास्त्र के अनुसार निर्धारित रंग का प्रयोग करते है तो अवश्य ही कुछ हद तक आपकी जिन्दंगी में खुशियों का रंग भर जाएगा।

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पवन पुत्र हनुमान जी का जन्म कैसे हुआ

पवन पुत्र हनुमान जी का जन्म कैसे हुआ
पवन पुत्र हनुमान जी का जन्म कैसे हुआ

ज्योतिषियों की गणना के अनुसार बजरंगबली जी का जन्म चैत्र पूर्णिमा को मंगलवार के दिन चित्र नक्षत्र व मेष लग्न के योग में हुआ था। हनुमानजी के पिता सुमेरू पर्वत के वानरराज राजा केसरी थे और माता अंजनी थी। हनुमान जी को पवन पुत्र के नाम से भी जाना जाता है और उनके पिता वायु देव भी माने जाते है। राजस्थान के सालासर व मेहंदीपुर धाम में इनके विशाल एवं भव्य मन्दिर हैं।

पुंजिकस्थली यानी माता अंजनी

पुंजिकस्थली देवराज इन्द्र की सभा में एक अप्सरा थीं। एक बार जब दुर्वासा ऋषि इन्द्र की सभा में उपस्थित थे, तब अप्सरा पुंजिकस्थली बार-बार अंदर-बाहर आ-जा रही थीं। इससे गुस्सा होकर ऋषि दुर्वासा ने उन्हें वानरी हो जाने का शाप दे दिया। पुंजिकस्थली ने क्षमा मांगी, तो ऋषि ने इच्छानुसार रूप धारण करने का वर भी दिया। कुछ वर्षों बाद पुंजिकस्थली ने वानर श्रेष्ठ विरज की पत्नी के गर्भ से वानरी रूप में जन्म लिया। उनका नाम अंजनी रखा गया। विवाह योग्य होने पर पिता ने अपनी सुंदर पुत्री का विवाह महान पराक्रमी कपि शिरोमणी वानरराज केसरी से कर दिया। इस रूप में पुंजिकस्थली माता अंजनी कहलाईं।

जब वानरराज को दिया ऋर्षियों ने वर

एक बार घूमते हुए वानरराज केसरी प्रभास तीर्थ के निकट पहुंचे। उन्होंने देखा कि बहुत-से ऋषि वहां आए हुए हैं। कुछ साधु किनारे पर आसन लगाकर पूजा अर्चना कर रहे थे। उसी समय वहां एक विशाल हाथी आ गया और उसने ऋषियों को मारना प्रारंभ कर दिया।

ऋषि भारद्वाज आसन पर शांत होकर बैठे थे, तभी वह दुष्ट हाथी उनकी ओर भी झपटा। पास के पर्वत शिखर से केसरी ने हाथी को यूं उत्पात मचाते देखा तो उन्होंने बलपूर्वक उसके बड़े-बड़े दांत उखाड़ दिए और उसे मार डाला। हाथी के मारे जाने पर प्रसन्न होकर ऋर्षियों ने कहा, ‘वर मांगो वानरराज।’ केसरी ने वरदान मांगा, ‘ प्रभु , इच्छानुसार रूप धारण करने वाला, पवन के समान पराक्रमी तथा रुद्र के समान पुत्र आप मुझे प्रदान करें।’ ऋषियों ने ‘तथास्तु’ कहा और वो चले गए। इसके बाद वानरराज केसरी के क्षेत्र में भगवान रुद्र ने स्वयं अवतार धारण किया। इस तरह श्रीरामदूत हनुमानजी ने वानरराज केसरी के यहां जन्म लिया।

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हनुमान जयंती: किस कामना के लिए हनुमान जी को क्या चढ़ाएं

हनुमान जयंती:  किस कामना के लिए हनुमान जी को क्या चढ़ाएं
हनुमान जयंती: किस कामना के लिए हनुमान जी को क्या चढ़ाएं

इस वर्ष 19 अप्रैल को हनुमान जयंती मनाई जाएगी जिसका अपना अलग ही महत्‍व है। हनुमान जयंती (Hanuman Jayanti) बजरंगबली के जन्म दिवस के रूप में मानते हैं।

हनुमान जयंती के दिन हनुमानजी की उपासना व चोला चढ़ाने से शुभ ऊर्जा-शक्ति मिलती है। जिनके कष्टों का अंत ना हो रहा हो वे बजरंगबली को तेल-सिंदूर का चोला अवश्य चढ़ाएं। जानिए, किस कामना के लिए हनुमान जी को क्या चढ़ाएं…

  • दरिद्रता दूर करने के लिए प्रति मंगलवार चना-चिरौंजी चढ़ाएं।
  • सौभाग्य, पुत्र कामना के लिए सिंदूर एवं चमेली का तेल चढ़ाएं।
  • कष्ट दूर करने गुड़ और मूंग चढ़ाएं
  • सुखों की वृद्धि के लिए हनुमान जयंती को ॐ हनुमते नमः की माला जपें।
  • पराक्रम वृद्धि के लिए हनुमानजी की गदा में सिंदूर व गाय का घी लगाकर लगाएं।
  • अपने परिवार की उन्नति के लिए चमेली के पुष्प चढ़ाएं।
  • संपत्ति के लिए गुड़, चना चढ़ाएं और घी के दीपक जलाएं।
  • कष्टों से निवारण हेतु हनुमानजी को सिंदूर, नारियल और लड्डू अर्पण करें।
  • जमीन, जायदाद के कार्यों की सफलता के लिए हनुमान चालीसा के 11 पाठ प्रतिदिन करें।
  • सुखों में वृद्धि व कोर्ट कचहरी के मामले से निपटने के लिए तेल का दान करें।
  • रूके हुए कार्यों में सफलता के लिए घी और सिंदूर का चोला और पीपल के पत्तों की माला राम नाम लिखकर चढ़ाएं।

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